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मोदी-शाह ने कभी सोचा ऐसा?

मैंने भी नहीं सोचा कि सीबीआई को ले कर ऐसी घटनाएं होगी!  सोचे, नरेंद्र मोदी ने क्या सोच कर आधी रात को आलोक वर्मा को हटाने का फैसला लिया और उसके बाद कैसा नैरेटिव बना? सुप्रीम कोर्ट से ऐसा फैसला आया कि अब नंवबर के दो-तीन सप्ताह सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, राफेल की जांच की बाते होती रहेगी। पूरे देश में सीबीआई की चर्चा है। नरेंद्र मोदी की मंशा, आधी रात की इमरजेंसी की बाते है। आलोक वर्मा आरोपी साबित हो या न हो और भले सरकार के मनमाफिक राकेश अस्थाना, नागेश्वर राव सीबीआई को चलाने वाले बने तब भी अगले छह महिने मतलब अप्रैल 2019 के आम चुनाव तक सीबीआई मुद्दा रहेगा। उसमें नरेंद्र मोदी की बदनामी वाली बाते अधिक होगी तो फायदे की कम। आगे अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह सीबीआई या ईडी के जरिए पी चिंदबरम या किसी भी क्षत्रप विपक्षी नेता को बदनाम करने का हल्लाबोल नहीं कर सकेगें। 

हिसाब से मोदी सरकार को सीबीआई में आलोक वर्मा को मैनेज रखना था। कुछ भी हो डायरेक्टर भी जब उन्हे मोदी सरकार ने बनाया था तो नौबत नहीं आने देनी थी जिससे आलोक वर्मा और उनके नीचे के गुजरात से लाए राकेश अस्थाना और एके शर्मा में रिश्ते ऐसे बने जिससे सरकार की परेशानी बने। नोट करे कि मूल लड़ाई गुजरात से आने के बाद राकेश अस्थाना बनाम एके शर्मा की है । अमित शाह के भरोसेमंद एके शर्मा थे। पहले राकेश अस्थाना था। अस्थाना क्योंकि नरेंद्र मोदी के निजी वफादार और भरोसेमंद थे इसलिए प्रधानमंत्री दफ्तर की गुजराती ल़ॉबी मतलब पीके शर्मा, टोपने, भरतलाल, कुनबे आदि की राकेश अस्थाना से अंतरंगता थी। राकेश अस्थाना की महत्वकांक्षा और डायरेक्टर बनना तय माने होने से आलोक वर्मा ट्रांजिशनल चेहरा माने गए। इस घमंड में सीबीआई में राकेश अस्थाना, गुजराती लॉबी ने राजनीति की। 

इसका नतीजा था जो आलोक वर्मा ने नंबर दो के बजाय नंबर तीन के एके शर्मा की अंहमियत बनाई। हकीकत है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने इसमें हर्ज नहीं माना। इससे राकेश अस्थाना और घुटे। सीबीआई में नंबर दो और नंबर तीन में ठनी तो राकेश अस्थाना ने आलोक वर्मा के खिलाफ भी भ्रष्टाचार का हल्ला करवाया तो नंबर तीन एके शर्मा को भी बदनाम कराया। 

हिसाब से नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों गुजरात के अपने दोनों भरोसेमंदो का झगडा सुलटाने में समर्थ थे। तभी अपने को समझ नहीं आया है कि कैसे एके शर्मा के जरिए अमित शाह ने सीबीआई हैंडल किए रखी तो राकेश अस्थाना ने नरेंद्र मोदी से बात करके क्यों नहीं एके शर्मा को पहले या तो हाशिए में डलवाया या खुद को जनवरी तक इंतजारी के मोड में रखा।

बहरहाल जो हुआ वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह के या तो वक्त खराब होने के चलते है या विनाशकाले विपरित बुद्वी वाली बात है। हद तो यह कि आलोक वर्मा की छुट्टी के साथ मोदी-शाह ने उन एके शर्मा को भी सीबीआई से बाहर फेंक खड्डे में डाला है जिनके पास अमित शाह-मोदी के कई राज है। 

सो आलोक वर्मा, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, दो-तीन सप्ताह सीवीसी से जांच का हल्ला अपनी जगह होते रहना है तो वही राकेश अस्थाना की जांच की पेचीदगी, एके शर्मा जैसे राजदार सीबीआई अफसरों के अंडमान तबादले से बनी खुन्नस और आज कल में राकेश अस्थाना याकि गुजराती लॉबी के ही कारण प्रवर्तन निदेशालय, ईडी में राजेश्वर सिंह पर होने वाली कार्रवाई से ऐसा रायता फैलेगा कि उसे रायते में एक तरफ नरेंद्र मोदी फिसले हुए होगे तो दूसरी और अमित शाह और तीसरी तरफ अरूण जेतली! अकेले डा सुब्रहमण्यम स्वामी ही इस रायते में कीचड भारी दिखला देने वाले है।

इस सबके अलावा फिर सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और सड़कों पर फैल गया राफेल का कीच़ड है। कल सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में राफेल का मामला है। चीफ जस्टीस आलोक वर्मा हाबडतौड हडबडी दिखाए या धीरे-धीरे विचार करते-करते फैसले सुनाते जाए और कार्रवाई बढ़ाते जाए सबकी सुर्खियां तो बनती जाएगी। 

क्या इस सबका नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पूर्वानुमान लगाया था?  इस सप्ताह अरूण जेतली की सलाह और सीवीसी के यहा नोट बनने और फिर आधी रात में अजित डोभाल से सीबीआई पर बिजली कडकाते वक्त नरेंद्र मोदी ने जो सोचा था क्या उसके बाद वैसी घटनाएं व नैरेटिव  बना? नहीं। तभी यह सब प्रमाण है कि अब मोदी राज के नियंत्रण में कुछ नहीं है। घटनाओं के भंवर में मोदी-शाह फंस गए है। और वक्त उनके नियंत्रण में नहीं।  

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