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लुटाओ, अब रिजर्व बैंक को!

आजाद भारत के 70 साल में जो नहीं हुआ वह नरेंद्र मोदी सरकार ने कर दिखाया। रिजर्व बैंक एक्ट की धारा सात का उपयोग कर रिजर्व बैंक को यदि गुलाम बनाया तो भला किसलिए? ताकि रिजर्व बैंक अपने दिमाग, अपने विवेक से फैसले नहीं करे और मोदी सरकार रिजर्व बैंक में जमा पैसे को बतौर कर्ज लुटवाए!  सोचिए, कौन इसका विरोध कर रहा है? रिजर्व बैंक का गर्वनर, वह उर्जित पटेल जिसने नरेंद्र मोदी की नोटबंदी का आंख बंद समर्थन किया था। जिसे मोदी की कठपुतली मानते हंै। उस उर्जित पटेल ने देश को दिवालिया न बनने देने, अर्जेंटाइना, वेनेजुएला जैसा न होने देने की चिंता में नरेंद्र मोदी, अरूण जेटली, वित्त मंत्रालय का कहना नहीं माना और इस्तीफा देने जैसी सोच चर्चा में आने दी। तभी सोच सकते है मोदी सरकार किस हद तक खजाने को लुटाने की सोच लिए है तो इस पर रिजर्व बैंक कैसी चिंता में है। 

वजह नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को अगले पांच महीनों में वोट लेने के लिए नोट लुटाने की प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को लघु-मझौले उद्यमियों को खुश करने के लिए उन्हंे 59 मिनट में एक करोड़ रुपए का कर्ज मुहैया कराने की सुविधा की घोषणा की। यह बात कुटीर-लघु-मझौले उद्योगों के चेहरे पर रौनक लाने वाली है। लेकिन कर्ज से ध्यान हटाना मकसद है। मोदी-जेटली समस्या की जड़ को नहीं देख रहे हैं। संकट कर्ज मिलने का नहीं है बल्कि मांग का है। याकि पूरी आर्थिकी में से लक्ष्मीजी की चंचलता के खत्म होने का है। ये कर्ज के मारे नहीं है बल्कि धंधे के चौपट होने से संकट में आए है। यही कॉरपोरेट घरानों के भी संकट की वजह है। उन पर लाखों-लाख रु का कर्जा क्यों है? वह बट्टेखाते वाला, एनपीए इसलिए बना क्योंकि बाजार में खरीददार नहीं। मनमोहन सरकार के वक्त बिजली पैदा करने वाले कारखानें, कंपनियां खूब खुली, बनी। उत्पादन बढ़ा मगर बाद में काम धंधे ऐसे चौपट हुए कि बिजली की मांग घटी और खपत के बजाय सरप्लस के संकट में बिजली उत्पादक ऐसे मरे कि बैंकों से लिया कर्ज नहीं चूका पाएं। तभी बिजली कंपनियों का दिवाला निकला हुआ है। इस पर नरेंद्र मोदी ने रास्ता यह निकलवाया कि गुजरात सरकार से इन कंपनियों की बिजली रेट बढ़वा दो। इनके ऊपर रिजर्व बैंक की कार्रवाई याकि दिवालिया घोषित होने की प्रक्रिया रूक जाए या एसबीआई से कर्ज माफ करवा दो या पुराना कर्ज भले न चुकाया हो नया कर्ज दे कर बैंकों में जमा जनता का पैसा लुटवा दो। 

ऐसी ही दशा रियल एस्टेट, बिल्डरों की है या लगभग सभी क्षेत्रों और कॉरपोरेट से मझौले सभी पैमाने के उद्योगों, ईकाइयों की है। इसका एक भयावह भंडाफोड गैर-बैंकिंग वित्तिय संस्था आईएलएंडएफएस का तब हुआ जब वह कर्ज किस्त अदा करने  में डिफाल्ट हुई। यह कंपनी सरकार की बनवाई, विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों को लिए हुए है बावजूद इसके केस रिजर्व याकि नकदी खत्म तो समझ सकते हैं कि कामधंधों में जावक ज्यादा है और आवक कम।

यह स्थिति सरकार की भी है। विकास दर, टैक्स वसूली बढ़ने के भारी प्रोपेगेडा की बीच की हकीकत है कि नरेंद्र मोदी सरकार, वित्त मंत्रालय वित्तिय दिवालियेपन की स्थिति में है। मोदी सरकार अपने खजाने याकि नरेंद्र मोदी बतौर चौकीदार सरकार के खजाने से सबकुछ लुटवा चुके हैं। खजाना खाली है तभी हम और आपके पैसे याकि आम आदमी की बचत जो किसी भी तरह कहीं भी जमा की हुई है उसका सरकार दिवालियापन छुपाने के लिए हर जगह उपयोग कर रही है। हां, जीवन बीमा निगम याकि एलआईसी छोटे- मध्यवर्गीय परिवार की बचत और रिटायर या बुढ़े होने के वक्त की सुरक्षा की बीमा पॉलिसी लिए होती है। ऐसे ही प्रोविंडेंट फंड में जमा आम आदमी के लिए भविष्य की गारंटी है। इन संस्थाओं को कमाई की, सुरक्षा की जगह पैसा निवेश कर रिटर्न की चिंता करनी चाहिए। लेकिन मोदी सरकार सरकारी प्रभुत्व की ऐसी संस्थाओं को भी लुटा दे रही है। 

हां, पता है आपको कि मोदी सरकार ने एलआईसी से दिवालिया बैंक आईडीबीआई में पैसा लगवाया। दिवालिया गैर-बैंकिग संस्था आईएलएंडएफएस में जनता का जमा पैसा उडेलवा रही है। इसके अलावा एलआईसी, प्रोविडेंट फंड का पैसा शेयर बाजार में तेजी बनाए रखने के लिए, एयर इंडिया जैसी दिवालिया एयरलाइंस को चलाए रखने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। 

सरकार का वित्तिय घाटा 3.3 फीसद की सीमा से पार होता लगता है तो अपने कब्जे की संस्थाओं से वह दिवालियां कंपनियों में पैसा डलवा रही है। मगर बात बन नही है और अब लोकसभा चुनाव सिर पर है तो मोदी सरकार की नजर रिजर्व बैंक की जमा पूंजी पर लगी है। हर देश का केंद्रीय बैंक सुरक्षित रिजर्व रखता है। उस रिजर्व पर बांड, विदेशी करेंसी भंडार से वह ब्याज की कमाई करता है तो देश की वित्तिय सुरक्षा बनाए रखता है यदि सब दिवालिया हो गए, वैश्विक स्थिति बेकाबू हुई या आपदा-विपदा जैसी स्थितियां बनी तो अपने रिजर्व से केंद्रीय बैंक उस समय सबकुछ संभाले रखने का प्रबंध लिए हुए है। मतलब रिजर्व बैंक पूरे देश को दिवालियां होने से बचाने का आर्थिक विचार, प्रबंधन, तैयारियों, रीति-नीति को लिए हुए होता है। 

उस प्रबंधन, उस खजाने, पैसे के रिजर्व पर अब नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली की नजर लग गई है। नरेंद्र मोदी ने अपने लालबुझक्कड आर्थिक सलाहकार गुरूमूर्ति को वहां स्वंतत्र डायरेक्टर बना कर बैठा दिया है। गुरूमूर्ती ने मोदी को समझाया कि रिजर्व बैंक के पास खजाना है तो उसमें से तीन- साढ़े तीन लाख करोड़ रु को दिवालिया हुई कंपनियों, बैंकों, गैर-बैंकिग संस्थाओं और दिवालियां कॉरपोरेट, छोटे-मझौले उद्यमियों को दिलाओं। ऐसे खत्म करों ऐसे केस की कड़की।

जाहिर है इससे चार महीने बाजार में रौनक संभव है। दिवाली मन जाएगी और फिर वोट पड़ेगें।

मतलब एक तरफ सियासी एजेंडे में अयोध्या में मंदिर और हिंदू-मुस्लिम है तो दूसरी और रिजर्व बैंक पर कब्जा कर अंबानी- अदानी से ले कर छोटे-मझौले उद्यमियों, किसान- मध्य वर्ग में धडाधड लोन याकि पैसा लुटवाना है। 

यह है स्वदेशी राजनीति और आर्थिकी के गुरू मंत्र!  

आश्चर्य कि रिजर्व बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल, डायरेक्टर विरल आर्चाय स्टेंड लिए हुए है कि हम ऐसा नहीं होने देगे। विरल आचार्य के लिए ताली बजाएं जो उन्होने भाषण दे कर वित्त मंत्रालय और सरकार के मंसूबे के विरोध की हिम्मत दिखाई। इसलिए क्योंकि जान ले कि यदि रिजर्व बैंक खाली हो गया तो अप्रैल 2019 में भले नरेंद्र मोदी जीत जाए, लोग मूर्ख बन जाएं लेकिन दिसंबर 2019 याकि एक-दो सालों में भारत इतना खोखला होगा कि अर्जेंटाइना, वेनेजुएला याकि लातिनी अमेरिकी देशों जैसा ऐसा दिवालियां देश बनेगा कि दुनिया सवा सौ करोड़ लोगों की दशा देख कंपकंपा उठेगी। मोदी-जेटली वोट के चक्कर में जनता के हर तरफ के खजाने को हर तरह से लुटाने की जिद्द में सबकों खोखला बना देगें। 

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  1. प्रणाम आपकी लेखनी को।

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