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कर्ज में कंगले और नए कर्ज फिर!

हम –आपके लिए अहम सवाल है। सोचे, रिर्जव बैंक को यदि 70 साल के कायदे से बाहर कर मोदी सरकार ने अपनी गिरफ्त के जरिए उसे लुटवाने की ठानी है तो हम नागरिक इस अर्थशास्त्र को कैसे समझे?  मतलब अंबानी- अदानी को देश के नेचुरल रिसोर्सेस, देश के ठेके, देश के खजाने से बतौर कर्ज कितना लुटाया जाए जो ये स्वस्थ याकि कर्ज अदायगी, देनदारी चुकाने की स्थिति में आए? सही है कि अंबानी-अदानी या मेहता, संघवी, पटेल, चौकसी, मोदी, पिरामल आज मोदी भारत के पर्याय है। मेक इन इंडिया, भारत की शान वाले ये वे छह-आठ नवरत्न है जिनके वाइब्रेंट गुजरात में नरेंद्र मोदी खिले तो उनकी सत्ता से ये पिछले साढ़े चार सालों से झूम कर नाच रहे है। 

हां, अपनी जगह रिसर्च वाली बात है कि पिछले साढ़े चार सालों में भारत के आकाश, पाताल और जमीन के प्राकृतिक संसाधनों में इन गुजरातियों ने कितनी मलाई खाई और कैसी मोनोपॉली बनाई। एक रिपोर्ट के अनुसार भरपूर मलाई के बावजूद मोदी के नवरत्न सेठों में कर्ज की देनदारी में ब्याज की अदायगी के लिए भी 18 प्रतिशत की रेट पर इन दिनों शार्ट टर्म के कर्ज लिए जा रहे है। मतलब मोदी सरकार से ठेके, मेहरबानी, चालीस-पचास-पचहत्तर हजार करोड़ रु के बैंकों से कर्ज और बावजूद इसके ब्याज अदा करने के लिए पैसा नहीं! 

सोचे, यदि ऐसे किसी पर पचास हजार या एक लाख करोड रु का बैंकों से लिया कर्ज है और वह डिफाल्टर हो गया है तो उसे दिवालिया घोषित कर उसके प्लाट-धंधों की कुर्की होने  चाहिए या नहीं?  मोदी सरकार उलटा कर रही है। बैंकों से नए कर्ज दिलवा रही है। इन बड़े क़ॉरपोरेट घरानों, एनबीएफसी कंपनियों पर सरकारी बैकों का कोई चार लाख करोड रु फंसा हुआ है। इनमें से कई कंपनियों के खिलाफ रिजर्व बैंक के 12 फरवरी 2018 के सर्कुलर अनुसार दिवालिया घोषित करने की कार्रवाई शुरू के आदेश दिए थे। 

मगर सरकार इनके लिए नए-नए रास्ते बनाती रही है। अब वह रिजर्व बैंक के खजाने को इन बडे घरानों, कंपनियों के लिए खोलती लगती है। इन कंपनियों को चुनाव से ऐन पहले लोन दिलाया जाएगा और बदले में यदि ये कंपनियां चुनावी बांड खरीद कर भाजपा को चंदा दे तो यह भी नामुमकिन नहीं है। 

ऐसा होना कितनी बेशर्मी वाली बात होगी। द वायर में वेणू की रिपोर्ट अनुसार रिजर्व बैंक को कब्जाने के सरकार के पैंतरे की प्रमुख वजह बडे घरानों याकि उद्योगपतियों को और लुटाने की तैयारी है। वित्त मंत्रालय ने एक तरफ रिर्जव बैंक के ढाई लाख करोड़ रु के आपातकालिन फंड को अपने कब्जे में कर चुनावी महीनों में लुटाने के चलते घाटे का प्रबंधन बनाना है तो छोटे-बडे नए लोन मेलों से वाहवाही की तैयारी भी है। ध्यान रहे बडे सरकारी बैंक अपने दिए कर्जों के डुबने से घाटे में फंसे हुए है तो गैर-बैंकिंग सरकारी कपंनियां भी कर्ज दे कर डुबी हुई है। एक रपट अनुसार इसी नवंबर में एनबीएफसी के डेढ़ लाख करोड रू के डेट पत्र (Debt papers) रिडीम होने है। फिर दिसंबर में 75 हजार करोड़ रु का रिडींपशन है। यदि ये भुने नहीं तो बाजार में हड़कंप मच जाएगा। तभी सरकार ने रिजर्व बैंक से गैर-बैंकिग संस्थाओं को नकदी उपलब्ध कराने के लिए रिजर्व बैंक को मजबूर करने वाला वह कदम उठाया जो 70 साल में कभी नहीं उठा।  

सो पूरी आर्थिकी और उसका हर वित्तिय पहिया कर्ज, खराब लोन, देनदारी में फंसा हुआ है। सरकार खुद वित्तिय घाटे की सीमा के कगार पर है। छोटे कर्जों में भी मुद्रा योजना हो या किसान क्रेडिट कार्ड या छोटे-मझौले उद्यमियों को दिए कर्ज सबमें डुबत खाते वाला एनपीए रिकार्ड आसामान पर है। सिडबी ने 2016-17 में 25 लाख गांरटियां मंजूर की जिसमें कुल कर्ज कोई एक लाख पच्चीस हजार करोड रू था। एक अध्ययन अनुसार छोटे कारोबारियों को दिए 1.2 लाख करोड़ रु के कर्ज में से मार्च तक 16 हजार करोड़ के एनपीए बनने की आंशका है।

मतलब डुबत खाता हर तरफ। आकंडा लाख, लाख या कि लाखों करोड़ रु का ऐसे है जैसे पूरा वित्तिय खाता ही डुबत खाते में परिवर्तित हो। अंबानी-अदानी हो या किसान या नौजवान के लिए मुद्रा कोष या एसएमई सेक्टर सब में गया पैसा डुबत और खावत!

तभी अब नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली की नजर रिर्जव बैंक के ऱखे हुए आपतकालीन फंड पर। मानों सरकारी बैंकों, जैसे पंजाब नेशनल जैसे बैंक से पैसा ले कर भागे नीरव मोदी, मेहुल चौकसी का चूना कम है जो अब रिर्जव बैंक से देश के खजाने को चूना लगाने की जिद्द है। सरकार का तर्क है कि आपतकालीन स्थिति है तो रिर्जव बैंक में रखा पैसा किस काम आएगा? सवाल है कि अंबानी-अदानी या पैसा डुबोई कंपनियों का आपातकाल कब देश का आपातकाल हो गया जो देश की इमरजेंसी के अंतिम खजाने रिर्जव बैंक को भी इनके खाने के लिए खोल दिया जाएं!

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