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तो नीतीश एनडीए के पीएम!

हां, नीतीश खेमा ऐसे ही ख्याल में उड़ रहा है। नीतीश कुमार को इस तरह समझाना अरुण जेटली के ही बूते संभव है। अमित शाह ने उन्हें समझाया हो, यह संभव है। मोटे तौर पर नीतीश खेमें में यह ख्याल है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को 200 सीटे नहीं आएगी। ऐसे में नरेंद्र मोदी खुद प्रधानमंत्री नहीं बन सकते लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह चाहेगें कि कैसे भी हो सरकार एनडीए की ही बने। इसके लिए फिर वे नीतीश कुमार को आगे बढ़ाएंगे और उनके नाम पर नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव जैसे प्रादेशिक क्षत्रप एनडीए से जुड़ेगे। 

मतलब नीतीश कुमार आगे नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली को बचाने के लिए ढाल बनेगे। क्या गजब मुंगेरीलाल का सपना है! पहली बात भाजपा की 200 या 180 सीटे कहां से आ रही है? दूसरी बात कि यदि भाजपा 200 सीटों से नीचे रही तो संघ और भाजपा के नेता क्या मोदी-शाह-जेटली की ढ़ाई नेताओं की टीम को मनमर्जी फैसले लेने देगे? तीसरी बात क्या नीतीश कुमार की जनता दल (यू) खुद बिहार में लोकसभा की दस सीटे जीत पाएंगी? अधिक अवसर जनता दल यू के चार-पांच सीटे जीतने का है।

कैसे? इसलिए क्योंकि जनता दल (यू) की अधिकांश सीटे लालू यादव की राजद पार्टी से मुकाबले वाली है। इन सीटों पर यादव, कुशवाह, दलित और मुस्लिम वोटों की एकजुटता के आगे नीतीश कुमार के उम्मीदवार कायदे से चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे. सचमुच रामविलास पासवान ने लोकसभा चुनाव लड़ने के बजाय भाजपा की मेहरबानी पर राज्यसभा सांसद बनने का जो फैसला लिया है तो वह जमीनी हकीकत की बानगी है। इस बात को समझ ले कि बिहार के दलित भी भाजपा को हराने के लिए उसी तरह ठाने बैठे है जैसे यूपी या चंबल क्षेत्र में दिख रहे हैं। जीतन राम मांझी अब बिहार के नंबर एक दलित नेता हो गए है क्योंकि वे भाजपा के खिलाफ खड़े है। रामविलास पासवान और उनके बेटे ने एलायंस में भाजपा से छह सीटे ले तो ली है लेकिन खुद चिराग पासवान के लिए चुनाव जीतना मुश्किल होगा। वे जिस भी सीट से चुनाव लड़े उन्हें मुस्लिम- दलित वोटों का टोटा होगा और भाजपा के फारवर्ड वोटों पर निर्भर रहेंगे।

उस नाते बिहार में मोदी-शाह का नीतीश-रामविलास के आगे सरेंडर बेहूदा था। इन दोनों नेताओं को आज भाजपा के वोटों की अधिक जरूरत है। प्रदेश की चालीस सीटों में भाजपा ने 2014 में 23 सीटे जीती थी। इन 23 में से 6 सीटे छोड़ना भाजपा के लिए घाटे का सौदा है। मगर चिराग पासवान- रामविलास ने टेंटूआ दबा कर भाजपा को मजबूर किया तो वजह अखिल भारतीय मैसेज याकि हवा का है। यदि पासवान एनडीए छोड़ देते तो पूरे देश में एनडीए के बिखरने, एनडीए में दलित नेता न होने की हवा बनती।  

संदेह नहीं कि पासवान के दबाव का नीतीश कुमार को अधिक फायदा हुआ। कोटे में जनता दल (यू) की 17 सीटे बन गई। अन्यथा मोदी-शाह उन्हंे ऐन वक्त तक अटकाएं रखते। मोदी-शाह के सरेंडर से ही नीतीश खेमें में उड़ान है कि चुनाव बाद नीतीश बाबू एनडीए के प्रधानमंत्री दांवेदार होगे। मोदी- शाह-जेटली किसी सूरत में भाजपा के किसी दूसरे नेता को आगे नहीं होने देगें और बाहरी पार्टी के ऐसे नेता के इर्द-गिर्द पार्टियों का जमावड़ा बनवाएंगे जिसको उनकी तरफ से, उनके हितों की चिंता में अरुण जेटली हैंडल करते रहेगें।

यह मुंगेरीलाल या दूर की कौड़ी वाला मामला है। इससे पलट अपनी थीसिस है कि मोदी-शाह और अरबपतियों की लॉबी को कम न कूंता जाए। प्लान ए, बी और सी सब बने हुए हैं। मैं अपनी उस एक्स्ट्रीम थीसिस को फिर दोहरा रहा हूं कि आसमान इधर से उधर हो जाए लेकिन नरेंद्र मोदी मई में दुबारा शपथ लेगें। इसके लिए वे कुछ भी करेगें, इसे दिमाग के प्राइमरी कोने में दबाकर रखें। 

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