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मंदिर का ही बचा आसरा?

ट्रेन, बस, हवाई जहाज की यात्रा से लेकर पान और चाय की दुकानों पर भी राजनीतिक चर्चा में आम लोग कहने लगे हैं कि भाजपा को अब सिर्फ राम मंदिर का आसरा है। चाहे राजनीति से तटस्थ लोग हों या भाजपा व नरेंद्र मोदी के अंध भक्त हों या दूसरी पार्टी समर्थक हों सबको लग रहा है कि अगले चार महीने में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की पहल हो सकती है। वह कैसे होगी इसे लेकर कई तरह की बातें हैं। खुद भाजपा के नेता कई तरह की बातें करके भ्रम फैला रहे हैं। जैसे भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा कि अदालत का फैसला नहीं आता है तो दूसरे विकल्प पर विचार होगा। दूसरा विकल्प क्या होगा, यह उन्होंने नहीं बताया पर इससे भाजपा समर्थकों को अलग-अलग तरह के विकल्पों के बारे में भ्रम फैलाने का मौका मिला। 

वैसे यह हर जानकार व्यक्ति के लिए सोचने वाली बात है कि अलग विकल्प क्या हो सकता है? क्या फैसला आने में देरी होगी तो सरकार अध्यादेश लाकर, जमीन का अधिग्रहण करके मंदिर निर्माण शुरू कराएगी या विश्व हिंदू परिषद और साधु संतों को खुली छूट देगी कि वे मंदिर बनाएं? आखिर कुछ सोच कर ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह बयान दिया कि मंदिर हम हीं बनाएंगे!

बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल है कि मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का क्या फैसला आ सकता है? भाजपा नेताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों के बयानों से तो ऐसा ही लग रहा है कि उनको भरोसा है कि चुनाव से पहले अयोध्या की विवादित जमीन के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला होगा। इसे समझने के लिए भाजपा नेताओं के बयानों को बारीकी से देखना होगा। एक दिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अयोध्या की विवादित जमीन का मामला दस दिन की सुनवाई का मामला है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत चाहे तो दस दिन में इसकी सुनवाई पूरी करके फैसला सुना सकती है। आश्चर्यजनक तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने सर्दियों की छुट्टियां शुरू होने से पहले तय कर दिया कि चार जनवरी को इस मामले पर बेंच बनाने के लिए सुनवाई होगी। पिछले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने चूंकि इसके लिए तीन जजों की बेंच बनाई थी इसलिए कहा जा रहा है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई भी तीन जजों की बेंच बनाएंगे, जो पिछले सात साल से लंबित इस मामले की सुनवाई करेगी। सो, यह देखना दिलचस्प होगा कि चार जनवरी को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच बना कर कब से सुनवाई की तारीख तय करती है। 

अगर सुनवाई की तारीख जल्दी तय होती है और यह आदेश होता है कि रोजाना सुनवाई होगी तो संभव है कि फैसला भी जल्दी आ जाए। भाजपा के नेता यहीं चाहते हैं। जिस दिन चीफ जस्टिस ने चार जनवरी की सुनवाई की तारीख तय की उसके तुरंत बाद केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इलाहाबाद के एक कार्यक्रम में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह इस मामले की सुनवाई करनी चाहिए। ध्यान रहे रविशंकर प्रसाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान इस मामले में रामलला के वकील थे। पर वे भूल गए कि अब वे कानून मंत्री हो गए हैं और इस तरह की बात करना सुप्रीम कोर्ट को आदेश देने की तरह है। पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने उनको इसकी याद दिलाई। पर उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। दूसरे केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को रोजाना सुनवाई करके मामले का फैसला करना चाहिए। ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के सामने 29 अक्टूबर को यह मामला आया था। तब उन्होंने इसे टालते हुए कहा था कि अदालत की और भी प्राथमिकताएं हैं और वह इस मामले पर जनवरी के पहले हफ्ते में सुनवाई करेगी। सो, चार जनवरी की सुनवाई में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि अदालत की दूसरी प्राथमिकताएं पूरी हुई हैं या नहीं!

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी के नेता मंदिर निर्माण को लेकर भरोसे में हैं और यह भरोसा इसलिए है क्योंकि उनको लग रहा है कि अदालत से फैसला हो जाएगा। कानून और अध्यादेश को लेकर वे आशंका में हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी जाएगी और अगर कानून बनाने का प्रयास हुआ तो वह संभव नहीं होगा क्योंकि जदयू, लोजपा जैसे कई सहयोगी ही इसका विरोध कर रहे हैं। अदालत के फैसले से उनको यह भी उम्मीद है कि कम से कम दो-तिहाई जमीन जरूर मिलेगी। असल में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन को निर्मोही अखाड़ा, रामलला और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर बराबर बांटने का आदेश दिया था। सो, हिंदू संगठनों को लग रहा है कि अगर पूरी जमीन नहीं मिलती है तब भी कम से कम दो तिहाई जमीन मिलेगी और उस पर मंदिर निर्माण का काम तत्काल शुरू हो जाएगा। यह भी कहा जा रहा बाकी जमीन के लिए सरकार कानून बना कर उसका अधिग्रहण कर लेगी। 

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