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कैसे कैसे सीएम बैठाए!

भाजपा कभी नेताओं की पार्टी हुआ करती थी। राष्ट्रीय राजनीति में उसके पास दर्जनों ऐसे नेता होते थे, जो लगातार विपक्ष में रहने के बावजूद अपनी धमक बनाए रखते थे। उनकी पूछ सत्ता में बैठे नेताओं से कम नहीं होती थी। राज्यों में भाजपा के पास एक से बढ़ कर एक नेता होते थे। असल में राज्यों से ही भाजपा के बड़े नेता निकलते थे। खुद नरेंद्र मोदी भाजपा की इसी परंपरा से निकले नेता हैं। पर पिछले पांच साल से भाजपा में नेता बनने बंद हो गए हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यों में नेता बनाने की भाजपा की फैक्टरी एक तरह से बंद कर दी है। मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और अमित शाह की रणनीति से भाजपा चुनाव जीती पर उसके बाद ऐसे नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया गया, जो अब पांच साल बीतने के बाद भी मोदी और शाह के भरोसे बैठे हैं। वे अपने दम पर चुनाव लड़ने का माद्दा नहीं रखते हैं। सब दिल्ली का मुंह देख रहे हैं। एक तो इन दोनों नेताओं ने राज्यों के बड़े नेताओं को दरकिनार कर नए नेतृत्व के नाम पर निराकार चेहरों को कमान सौंपी। दूसरे, हर राज्य में बाहर से लाए गए नेताओं को भाजपा के जमीनी नेताओं से ज्यादा महत्व देकर सरकार में शामिल किया। उनके सहारे राजनीति चलाई। इसका नतीजा है कि अगले साल जितने राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां कोई भी मुख्यमंत्री अपने दम पर चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है। 

भाजपा को असम में पहली बार सत्ता मिली तो मुख्यमंत्री भले सर्बानंद सोनोवाल बने पर पार्टी और सरकार पूरी तरह से कांग्रेस से आए हिमंता बिस्वा सरमा के भरोसे हो गई। भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के दशकों पुराने अपने एजेंडे पर चुनाव लड़ा था। पर अब सारा मामला राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी की बहस में उलझा है। लोकसभा चुनाव आठ महीने बाद होने हैं और घुसपैठियों को बाहर निकालने की कोई योजना सरकार के पास नहीं है। सोनोवाल न तो अपने नेतृत्व का करिश्मा बना पाए हैं और न पार्टी के एजेंडे लागू हुए हैं। सब कुछ मोदी भरोसे है। 

यहीं हाल हरियाणा का है, जहां भाजपा पहली बार सत्ता में आई है। सरकार बनने के बाद पार्टी के पुराने नेताओं को किनारे करके पहली बार विधायक बने मनोहर लाल खट्टर को कमान सौंपी गई। खट्टर न तो राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए उपयोगी साबित हुए हैं और न प्रशासनिक रूप से। जाट आरक्षण आंदोलन से लेकर रामरहीम की गिरफ्तारी तक कानून व्यवस्था काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। सरकार में हर दिन का झगड़ा अपनी जगह है। चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़ने वाले बीरेंद्र सिंह और राव इंद्रजीत सिंह को केंद्र सरकार में मंत्री बना कर खास तरजीह दी गई। कहां तो केंद्र में अपनी सरकार होने के कारण चार साल में राज्य की पहली भाजपा सरकार का इकबाल बुलंद होना चाहिए था पर कुल मिला कर सरकार निकम्मी साबित हुई है। दो सांसद अलग पार्टी बना रहे हैं और दो अन्य सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं। खट्टर मजे में बैंठे हैं कि जो होगा मोदी और शाह देखेंगे। 

पिछले लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव हुए थे और भाजपा जीती थी। तीनों राज्यों में भाजपा ने प्रयोग किया। हरियाणा में गैर जाट, महाराष्ट्र में गैर मराठा और झारखंड में गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया। इसका मकसद यह बताया था कि लंबे समय से राज करने वाली जातियों के प्रति लोगों में नाराजगी है और अगर उनसे अलग किसी जाति या समूह को आगे किया जाएगा तो ध्रुवीकरण होगा। पर क्या झारखंड में रघुवर दास गैर आदिवासियों का ध्रुवीकरण करा पाए हैं? आदिवासी को नाराज हुए ही उलटे रघुवार दास गैरआदिवासियों की बजाय एक जाति के नेता बन कर रह गए। इसका नतीजा यह हुआ है कि भाजपा विधानसभा का चुनाव लोकसभा के साथ कराने की जोखिम लेने जा रही है। पर खतरा यह है कि राज्य सरकार की नाराजगी का ठीकरा केंद्र के सर न फूटे। 

यहीं स्थिति कमोबेश हरियाणा और महाराष्ट्र में भी है। महाराष्ट्र में न तो देवेंद्र फड़नवीस गैर मराठों के नेता बन पाए और न हरियाणा में खट्टर गैर जाटों के नेता बने। राज्य के अहीर नेता राव इंद्रजीत सिंह केंद्र में मंत्री होने के बावजूद अलग पार्टी बना रहे हैं और पिछड़ी जाति के सांसद राजकुमार सैनी ने अलग पार्टी बना ली। महाराष्ट्र में भी फड़नवीस के कारण मराठा नाराज हुए पर इसका फायदा उठा कर वे दलित, पिछड़ों को नहीं साध पाए। 

नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने गृह राज्य गुजरात में विजय रूपानी को मुख्यमंत्री बनाया है। जिस कुर्सी पर नरेंद्र मोदी बैठे और उससे पहले केशुभाई पटेल रहे उस पर रूपानी का कोई मतलब नहीं है। वे न तो गुजरात के विकास मॉडल में फिट हैं और न राज्य के जातीय समीकरण में। पर नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा के कारण वे मुख्यमंत्री बने हुए हैं। उनको भरोसा है कि मोदी का चमत्कार चुनाव जीता देगा। 

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मोदी और शाह ने योगी आदित्यनाथ को कमान दी है। जब योगी एक साधारण सांसद थे तब मोदी और शाह ने उत्तर प्रदेश में 73 सांसद जीता दिए। जब योगी को मुख्यमंत्री बनाया तो भाजपा इनमें से तीन सीटें हार कर 70 पर आ गई। अब ये 70 सीटें अगले चुनाव में कैसे बचेंगी, यह योगी का सिरदर्द नहीं है। वे तो भगवा पहन कर गद्दी पर बैठे हैं और चुनावी जिताने की जिम्मेदारी मोदी, शाह की है। दोनों ने योगी को हिंदुत्व का चेहरा बना कर पेश किया पर वे ठाकुर चेहरा बन कर रह गए। 

भाजपा किस तरह से मोदी के चमत्कार के सहारे हो गई है इसे उनके आने से पहले और उनके आने के बाद बने मुख्यमंत्रियों के फर्क से समझा जा सकता है। उनके आने से पहले मुख्यमंत्री रहे नेता अपने दम पर राजनीति कर रहे हैं। मोदी और शाह ने भी उनके नेतृत्व को स्वीकार कर अगले चुनाव का चेहरा बनाया। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह अपने दम पर चुनाव लड़ रहे हैं। पर 2014 मई के बाद बनाए गए मुख्यमंत्रियों में से किसी में ऐसा दम नहीं है, जो मोदी और शाह को भरोसा दिला सकें कि आप बैठें, मैं लोकसभा में आपको सीटें जीत कर देता हूं! आपने मुझे मुख्यमंत्री बनाया, अब मैं आपको प्रधानमंत्री बनाऊंगा! उलटे मुख्यमंत्री बनने के बावजूद सारे नेता मोदी का मुंह देख रहे हैं। मोदी और शाह को इस हकीकत का अंदाजा है। 

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