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आरबीआई के उर्जित से झगड़ा 

भारतीय रिजर्व बैंक में रघुराम राजन की जगह गुजरात के उर्जित पटेल को गवर्नर बनाने का फैसला नरेंद्र मोदी ने यह सोच कर किया था कि वे जो कहेगें उसी रास्ते पटेल चलेगें। यों भी उर्जित को ले कर कई तरह की कहानियां थीं। वे गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन से जुड़े रहे थे, जिसके ऊपर हजारों करोड़ रुपए की गड़बड़ी के आरोप लगे थे। उन्होंने जिस तरह आनन फानन में नोटबंदी जैसे फैसले को लागू किया और अनगिनत बार नियमों को बदला तो उसे देख सोचा भी नहीं जा सकता था कि वे भी कभी सरकार से उलझ सकते हैं। पर वे न सिर्फ सरकार से उलझ गए हैं, बल्कि कहा जा रहा है कि अगर सरकार ने आरबीआई कानून की धारा सात का इस्तेमाल कर केंद्रीय बैंक को कुछ निर्देश दिए तो वे इस्तीफा दे सकते हैं। वे इस्तीफा देंगे तो उनके साथ साथ डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य भी इस्तीफा देंगे, जिन्होंने पिछले दिनों साफ कहा कि सरकार आरबीआई के कामकाज में दखल देने का प्रयास कर रही है। उन्होंने अर्जेंटीना का हवाला देकर यह भी बताया है कि कैसे वहां सरकार ने केंद्रीय बैंक में दखल दिया तो वहां भारी आर्थिक संकट आया। 

असल में रिजर्व बैंक का झगड़ा भी धन्ना सेठों को बचाने या उनकी थैली भरने की सोच की वजह से है। विवाद की असली शुरुआत आरबीआई की ओर से 12 फरवरी को जारी एक सरकुलर से हुई, जिसमें केंद्रीय बैंक ने कहा कि एक निश्चित अवधि के बाद अगर कंपनियां कर्ज की किस्तें चुकाने में एक दिन का भी डिफॉल्ट करती हैं तो उनके खिलाफ दिवालिया कार्रवाई शुरू हो जाएगी। इस सरकुलर की जद में कई बड़ी कंपनियां आ गईं। सो, उन कंपनियों ने इस सरकुलर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। हैरानी की बात है कि उन कंपनियों के साथ साथ केंद्र सरकार ने भी आरबीआई के सरकुलर का विरोध किया और कंपनियों को राहत दिलाई। 

दूसरा, विवाद आरबीआई से अलग पेमेंट रेगुलेटरी बोर्ड, पीआरबी बनाने का है। अंतर मंत्रालयी समिति ने इसकी सिफारिश की है और 2017 में बनाए गए कानून की कई शर्तों को बदल दिया है। 2017 के कानून के मुताबिक रिजर्व बैंक के गवर्नर को इसका पदेन अध्यक्ष बनाया जाना था। पर अब कहा गया है कि उसकी सलाह से सरकार दूसरा व्यक्ति अध्यक्ष नियुक्त करेगी। आरबीआई ने इसका विरोध किया है। उसका कहना है कि आरबीआई के गवर्नर के हाथ में ही इस बोर्ड की कमान रहनी चाहिए और उसे कास्टिंग वोट यानी किसी मामले में विवाद होने पर निर्णायक वोट का अधिकार मिलना चाहिए। सो, आरबीआई ने इसका विरोध किया है। 

अब सबसे बड़ा सवाल है कि जब आरबीआई सेविंग्स, लोन्स, पेमेंट्स सबकी निगरानी कर रही है तो पेमेंट्स के लिए अलग रेगुलेटर की क्यों जरूरत है? डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा देने में आरबीआई के विफल होने का आरोप लगा कर यह बोर्ड बनाया जा रहा है। पर इसमें आगे कुछ और मंशा दिख रही है। कहीं ऐसा तो नहीं है तो थोक के भाव से जो निजी पेमेंट बैंक्स खुल रहे हैं आगे उन सबका कंट्रोल इस बोर्ड के तहत लाने का इरादा है? रिलायंस ने इसी साल जियो पेमेंट बैंक शुरू किया है। इससे पहले एयरटेल, इंडिया पोस्ट, पेटीएम पेमेंट बैंक, आदित्य बिरला पेमेंट बैंक और फिनो पेमेंट बैंक खुल चुके हैं। यानी छह निजी पेमेंट बैंक चल रहे हैं। ये बैंक कर्ज नहीं देंगे और बचत खातों में भी एक लाख रुपए से ज्यादा जमा नहीं ले सकते हैं। पर इनका इस्तेमाल भुगतान की व्यवस्था के लिए किया जा सकता है। इसका मकसद तो वित्तीय समावेश का है पर पीआरबी बनाने की पहल के बाद इस पर सवाल उठने लगे हैं। ध्यान रहे अगस्त 2015 में रिजर्व बैंक ने 11 पेमेंट बैंक्स की मंजूरी दी थी। 

रिजर्व बैंक के साथ विवाद का तीसरा बड़ा कारण गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, एनबीएफसीज की खस्ता हालत का है। सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक इन संस्थाओं में पैसे डालता रहे। पर उर्जित पटेल ने बैंकों की नकेल कसी हुई है। करीब आधे बैंकों को आरबीआई ने पीसीए यानी प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन के तहत रखा है। ऐसे बैंकों के कर्ज देने पर रोक लगी है। अगर इनको कर्ज देने लायक बनाना है तो सरकार को पहले इन्हें रिकैपिटलाइज करना होगा। लेकिन सरकार के पास तो खुद ही पैसा नहीं है कि वह बैंकों को कहा से दे। सरकार को इस बात की भी नाराजगी है कि उसने रिजर्व बैंक से लाभांश के रूप में 66 हजार करोड़ रुपए प्राप्त करने का लक्ष्य रखा था पर रिजर्व बैंक ने सिर्फ 30 हजार करोड़ रुपए ही दिए। सरकार ने ज्यादा पैसे की मांग की तो केंद्रीय बैंक ने साफ इनकार कर दिया। 

इस बीच सरकार ने उर्जित पटेल पर लगाम लगाने के लिए एस गुरुमूर्ति को रिजर्व बैंक में स्वतंत्र निदेशक के तौर आरबीआई में नामित कर दिया। जानकार सूत्रों का कहना है कि आरबीआई बोर्ड की पिछली बैठक में उर्जित पटेल की टीम और गुरुमूर्ति के बीच नोकझोंक भी हुई। गुरुमूर्ति गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं को मदद करने के पक्ष में हैं। ऐसी संस्थाओं का सबसे बड़ा संकट आईएल एंड एफएस की वजह से है। इस पर 94 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। अगर यह कंपनी डूबी तो पूरा सेक्टर ही डूब जाएगी। देश भर के गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के ऊपर करीब चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। सो, बैंकिंग और गैर बैंकिंग दोनों सेक्टर को लेकर सरकार मुश्किल में फंसी है और तभी आरबीआई से झगड़ा है। 

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