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नोटबंदी की सचाई छिप नहीं रही

सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम ने नोटबंदी की सचाई जाहिर कर दी है। उन्होंने इसे बेहद क्रूर और अर्थव्यवस्था को झटका देने वाला फैसला बताया है। कहा जा सकता है कि उन्होंने तभी इस फैसले का विरोध क्यों नहीं किया था और उसी समय लोगों को इस बारे में क्यों नहीं बताया था? हो सकता है कि उनको इस बात का अफसोस हो और तभी उन्होंने अब सचाई बयान की है। उनके बाद अब बड़ा सवाल यह है कि बाकी लोग कब बोलेंगे? नोटबंदी के बाद कहा जा रहा था कि सरकार ने अपने उस समय के आर्थिक सलाहकार यानी अरविंद सुब्रह्मण्यम से इस पर राय नहीं ली थी। इसी तरह यह भी तथ्य है कि कैबिनेट के दूसरे सहयोगियों और पार्टी नेताओं को इस मामले में भरोसे में नहीं लिया गया था। सो, उनकी पार्टी और सरकार से जुड़े लोग कब चुप्पी तोड़ेंगे? क्या यह उम्मीद की जाए कि राज्यों के चुनावों के बाद आगे के चुनावों में भाजपा को झटका लगे तब पार्टी के दूसरे नेता बोलेंगे? अलग अलग तरीकों से नोटबंदी की सचाई जाहिर हो रही है पर भाजपा के नेता और केंद्र सरकार के मंत्री मुंह पर ताले लगा कर बैठे हैं! बावजूद इसके उनकी चुप्पी से सचाई नहीं छिपने वाली है।

अभी पिछले महीने नोटबंदी के दो साल पूरे हुए। विपक्ष ने देश भर में इसका शोक मनाने के लिए कोई न कोई आयोजन किया पर भाजपा और केंद्र सरकार दोनों चुप रहे। जब राहुल गांधी ने चुनावी सभाओं में पूछना शुरू किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोटबंदी पर क्यों नहीं बोलते और भ्रष्टाचार की बात क्यों नहीं करते तो मोदी ने मध्य प्रदेश की सभाओं में औपचारिकता की खातिर दो-तीन जगह कहा कि काला धन बाहर लाने के लिए नोटबंदी की कड़वी दवा देनी पड़ी। बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं। कायदे से उनको हर सभा में इस कड़वी दवा के बारे में बताना चाहिए था और उनके प्रवक्ताओं को भी हर प्रेस कांफ्रेंस में नोटबंदी पर वोट मांगने चाहिए थे। पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि इसकी सचाई कुछ और है। 

यह सचाई धीरे धीरे सामने आने लगी है। पहले रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट से पता चला कि चलन से बाहर किए गए पांच सौ और एक हजार के नोट का 99 फीसदी बैंकों में वापस आ गया। अगर नेपाल, भूटान से लेकर अमेरिका तक लोगों के पास पड़े पुराने नोटों की वापसी हुई तो वापस हुए नोटों की मात्रा सौ फीसदी से ज्यादा हो जाएगी। तभी भाजपा के नेता इस पर कुछ भी बोलना नहीं चाहते हैं। वे इसे भूल जाना चाहते हैं। पर असल में सरकार का यह फैसला आम लोगों को सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला रहा है, इसलिए आम जनमानस से इसे निकालना संभव नहीं होगा। 

यह फैसला आम आदमी के लिए कितना तकलीफदेह था, इसे नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रहमण्यम की इस टिप्पणी से समझा जा सकता है – नोटबंदी बेहद क्रूर और जबरदस्त मौद्रिक झटका था, जिससे देश की विकास दर पटरी से उतर गई। कुछ ही समय पहले सुब्रह्मण्यम ने आर्थिक सलाहकार का पद छोड़ा था। पर 2016 के नवंबर में जब प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का फैसला किया था तब वे मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। लेकिन उस समय वे चुप रहे। इसलिए अभी यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने अपनी किताब बेचने के लिए यह खुलासा किया है। 

सुब्रहमण्यम ने ऑफ कौंसिल-द चैलेंजेज ऑफ मोदी-जेटली इकोनॉमिक्स नाम से किताब लिखी है, जो जल्दी ही रिलीज होने वाली है। इस किताब में उन्होंने नोटबंदी पर एक पूरा अध्याय लिखा है। संभवतः पहली बार नोटबंदी के समय सरकार की आर्थिक नीतियों से जुड़े किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति ने इतने विस्तार से इस फैसले पर लिखा है। टू पजल ऑफ डिमोनेटाइजेशन अध्याय में सुब्रह्मण्यम ने इसे बेहद क्रूर और झटका देने वाला फैसला बताया है और कहा है कि इस फैसले से आर्थिक विकास दर में अचानक बड़ी गिरावट हुई। उन्होंने लिखा है – नोटबंदी से पहले औसत विकास दर आठ फीसदी थी, जो नोटबंदी के बाद की तिमाहियों में गिर कर 6.8 फीसदी पर पहुंच गई। यानी 1.2 फीसदी की गिरावट हुई। अगर भारत की अर्थव्यवस्था को डेढ़ लाख करोड़ रुपए की मानें तो यह नुकसान एक लाख 80 हजार करोड़ रुपए का था। बाकी बैंकों का जो खर्च हुआ, नौकरियां गईं, रोजगार बंद हुए, लोगों के समय का नुकसान हुआ वह सब अलग है। उन्होंने लिखा है – अचानक पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट बंद करने से आर्थिकी को तगड़ा झटका लगा था। एक ही झटके में 86 फीसदी करेंसी को कागज का टुकड़ा बना देने की सबसे बड़ी मार असंगठित क्षेत्र पर पड़ी थी। लेकिन इस क्षेत्र की हालत जानने के लिए औपचारिक संकेतों को सामने रखने से जीडीपी के आंकड़े गड़बड़ाते हैं। यह फार्मूला कुछ हद तक ही तस्वीर सामने रख सकता है, क्योंकि अगर अनौपचारिक क्षेत्र की आमदनी कम होगी तो औपचारिक क्षेत्र से मांग पर असर पड़ेगा।

सुब्रह्मण्यम ने इस अध्याय में लिखा – नोटबंदी एक अनोखा फैसला था। आधुनिक इतिहास में ऐसी कोई मिसाल नहीं है, जब सामान्य परिस्थितियों में किसी देश ने नोटबंदी जैसा फैसला किया हो। यह एक अभूतपूर्व फैसला था जो आधुनिक समय में किसी भी देश ने नहीं किया है। आमतौर पर धीरे-धीरे पुराने नोटों को सिस्टम से हटाया जाता है और सिर्फ युद्ध, मुद्रा संकट या राजनीतिक उथलपुथल के समय ही ऐसे फैसले किए जा सकते हैं। उन्होंने आगे लिखा – नोटबंदी का फैसला करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास कोई ठोस वजह नहीं थी। इस तरह उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया कि काला धन बाहर लाने, आतंकवादियों व नक्सलियों की कमर तोड़ने और जाली नोट खत्म करने के मकसद से नोटबंदी की गई थी। वैसे भी नोटबंदी के दो साल बाद यह साबित हो गया है कि इनमें से कोई भी मकसद पूरा नहीं हुआ है। सुब्रह्मण्यम ने दावा करते हुए लिखा है – इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं है और न कोई बहस है कि नोटबंदी के फैसले से विकास दर में बड़ी गिरावट आई। बहस इस बात पर है कि यह दो फीसदी घटी या उससे ज्यादा। उन्होंने आगे लिखा – उस दौरान ऊंची ब्याज दर, जीएसटी और तेल की कीमतों से भी विकास दर गिरी थी। 

इतना विस्तार से लिखने के बाद सुब्रह्मण्यम यह बात गोल कर गए कि नोटबंदी के फैसले के बारे में उनको जानकारी थी या नहीं और उनसे राय ली गई थी या नहीं। हो सकता है कि आगे किसी समय वे इस बात का खुलासा करें कि उनको इस बारे में जानकारी नहीं थी। जैसे कि नोटबंदी के समय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे रघुराम राजन ने किया। रिजर्व बैंक से हटने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी और इसलिए उनको अपने नोट बदलवाने के लिए अमेरिका से भारत वापस आना पड़ा था। उन्होंने भी नोटबंदी के फैसले पर कहा था कि यह बिना सोचे विचारे किया गया था फैसला था। 

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