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झारखंड में गठबंधन की बेहतर संभावना

बिहार के मुकाबले झारखंड में महागठबंधन की संभावना बेहतर दिख रही है। कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, झारखंड विकास मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन मोटे तौर पर बन गया है। इसमें सीटों को लेकर कुछ खींचतान जरूर है पर चारों पार्टियों के नेताओं को भरोसा है कि वे इसे सुलझा लेंगे। इस तरह का राजनीतिक गठबंधन इससे पहले 2004 में बना था, तब कांग्रेस की कमान वाले इस गठबंधन को राज्य की 14 में से 13 सीटें मिली थीं। विपक्षी पार्टियां एक बार फिर वहीं चमत्कार करना चाहती हैं। 

पर तब से अभी फर्क यह है कि उस समय बाबूलाल मरांडी भाजपा में थे और भाजपा की ओर से इकलौते जीते सांसद वे ही थे। इस बार उनकी वजह से समीकरण में पेंच आया हुआ है। वे दो सीटें मांग रहे हैं, जिसमें से एक सीट गोड्डा की है। उनकी पार्टी के नंबर दो नेता प्रदीप यादव वहां से विधायक हैं और पिछले काफी समय से वे वहां जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। अडानी के पावर प्रोजेक्ट के विरोध में उन्होंने काफी आक्रामक प्रदर्शन किया और छह महीने जेल में रहे। दूसरी ओर कांग्रेस के पास पूरे प्रदेश में यही एक सीट है, जहां से मुस्लिम उम्मीदवार लड़ाया जा सकता है। कांग्रेस पूर्व सांसद फुरकान अंसारी को इस सीट से लड़ाना चाहती है। मरांडी का सुझाव है कि फुरकान अंसारी ध्रुवीकरण के कारण चुनाव हार जाएंगे, इसलिए उनको राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव 
दिया जाए। 

मरांडी एलायंस बनाए रखना चाहते हैं इसलिए उन्होंने नाराजगी के बावजूद यह प्रस्ताव दिया कि वे कोडरमा सीट छोड़ देंगे, जहां से वे खुद लड़ना चाहते हैं पर गोड्डा नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस कोडरमा से मुस्लिम प्रत्याशी लड़ा ले। अभी तो राजद भी दो सीटों की मांग कर रहा है पर ऐसा माना जा रहा है कि अंत में एक सीट पर उससे समझौता हो जाएगा। असल में झारखंड में महागठबंधन में चल रहा विवाद कुछ हद तक दो संथाल आदिवासी नेताओं के अहम के टकराव का भी मामला है। बाबूलाल मरांडी और हेमंत सोरेन दोनों संथालपरगना के आदिवासी नेता हैं। दोनों के लिए एक दूसरे को नेता स्वीकार करना बहुत आसान नहीं है। इस वजह से भी कुछ हद तक खींचतान है। 

पर गठबंधन बचाने के लिए दोनों को साथ ही रहना होगा। दोनों में से किसी के अलग होने का असर व्यापक होगा। अगर जेएमएम गठबंधन से अलग हो तो उसके साथ राजद भी चली जाएगी। इसका कारण यह है कि रांची की जेल में बंद राजद सुप्रीमो झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ अच्छे संबंध रखना चाहते हैं। लालू प्रसाद को ऐसा लग रहा है कि वे अब जेल में ही रहने वाले हैं और जेएमएम किसी न किसी तरह सत्ता में रहेगी तो उसके होने का फायदा होगा। अगर जेएमएम और राजद एक साथ हुए तो दूसरी ओर भाजपा छोड़ कर आजसू का तालमेल कांग्रेस और जेवीएम से हो सकता है। तभी लड़ाई त्रिकोणात्मक होगी। अगर बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम बाहर हुई तब भी लड़ाई त्रिकोणात्मक होगी। तिकोनी लड़ाई में फायदा भाजपा को होगा। एलायंस होने की स्थिति में जहां वह दो सीटें जीतने की स्थिति में हैं, वहीं त्रिकोणात्मक लड़ाई में वह छह से आठ सीटें जीत सकती है। 

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