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अदानी छाप बिजली कंपनियों को लुटाना

देश भर की बिजली कंपनियां संकट में हैं। इस संकट के कई कारण हैं। कहीं ज्यादा कीमत होने की वजह से कोयला आधारित परियोजनाएं डूब रही हैं तो कहीं कंपनियों के पास सरप्लस बिजली होने की वजह से समस्या है। इसमें मोदी सरकार की खास कंपनियों अडानी, एस्सार, टाटा पावर ज्यादा फंसी है तो इस संकट पर ध्यान भी अधिक है। गुजरात में अदानी का मुंदरा थर्मल पावर प्रोजेक्ट लगभग ठप्प है और उसे भारी नुकसान है तो उसकी भरपाई के लिए सरकार ने बेशर्मी से काम कर रही है।   

सरकार ने इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 में बदलाव का मसौदा बनवाया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को छोड़ कर दूसरा कोई नेता या पार्टी इस पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। केजरीवाल ने इसके खिलाफ देश भर में आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है। ध्यान रहे दिल्ली में केजरीवाल ने पिछले चार साल से बिजली की दरें नहीं बढ़ने दी हैं और चार सौ यूनिट से कम बिजली इस्तेमाल करने वालों को 50 फीसदी सब्सिडी भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि अगर मसौदा कानून को मंजूरी मिली तो बिजली में वायदा कारोबार शुरू हो जाएगा, जिसका फायदा अंततः बड़ी बिजली कंपनियों को होगा। केजरीवाल ने खासतौर से यह जिक्र किया है कि प्रधानंमत्री मोदी के करीबियों की बिजली कंपनी को ज्यादा फायदा होगा। 

दूसरा मामला टाटा, एस्सार और अडानी के गुजरात के पावर प्रोजेक्ट का है। ऐसा लग रहा है कि आम लोगों की कीमत पर इन कंपनियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है और सरकार ने इस काम में सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश के सबसे बड़े बैंक और गुजरात सरकार सबको शामिल किया हुआ है। असल में इन तीन कंपनियों ने 2010 में गुजरात में कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्र लगाया था। जैसा कि हर टेंडर में होता है, कई शर्तों के साथ इनको संयंत्र की मंजूरी मिली थी, जिसमें एक शर्त यह थी कि अगले 25 साल तक ये कंपनियां बिजली की कीमत एक निश्चित मात्रा से ज्यादा नहीं बढ़ा सकती हैं। इन तीनों कंपनियों ने महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के साथ पावर परचेज एग्रीमेंट, पीपीए किया था। 

कुछ ही दिन बाद इंडोनेशिया में कानून बदलने का हवाला देकर तीनों कंपनियों ने बिजली की दरें बढ़ाने की मांग शुरू कर दी, जो की शर्तों के मुताबिक नहीं थी। 2013 में टाटा समूह की कोस्टल गुजरात पावर लिमिटेड, सीजीपीएल और अडानी पावर ने सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन, सीईआरसी से अनुरोध किया कि इंडोनेशिया से आयात होने वाला कोयला महंगा हो गया है इसलिए उनको कीमत बढ़ाने की मंजूरी दी जाए। पर सीईआरसी ने उनकी मांग ठुकरा दी और कहा कि यह शर्तों का उल्लंघन होगा। 

इसके बाद इन कंपनियों ने एपलेट ट्रिब्यूनल ऑफ इलेक्ट्रिसिटी, एपटेल से संपर्क किया और अपने नुकसान की भरपाई के लिए दरें बढ़ाने का अनुरोध किया। 2016 में एपटेल ने इसकी इजाजत दे दी। फिर गैर सरकारी संगठनों एनर्जी वाचडॉग की पहल पर मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में एपटेल के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने इन कंपनियों से कहा कि वे अपने नुकसान की भरपाई के लिए ग्राहकों के ऊपर बोझ नहीं डाल सकती हैं।    

इसके बाद इन कंपनियों को राहत दिलाने का सरकारी प्रयास शुरू हुआ। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर जज जस्टिस आरके अग्रवाल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई। इस कमेटी को 45 दिन में रिपोर्ट देने को कहा गया। अब इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सोमवार को सुनवाई करते हुए सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन से कहा है कि इन तीन बिजली कंपनियों ने राज्यों के साथ जो पीपीए किया है उसे बदलने के बारे में वह आठ हफ्ते में एक रिपोर्ट दे। इससे ऐसा लग रहा है कि पीपीए में तय की गई बिजली की दरों पर फिर से विचार का रास्ता साफ हो गया है। यानी कंपनियों को बिजली के दाम बढ़ाने की मंजूरी मिल सकती है। एनर्जी वाचडॉग का मानना है कि अगर टाटा, एस्सार और अडानी की बिजली कंपनियों को एक रुपए प्रति यूनिट कीमत बढ़ाने की मंजूरी मिली तो अगले 30 साल में उन्हें एक लाख 90 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे, जो जाहिर है कि आम लोगों की जेब से निकलेंगे। 

यह मामला इतना ही नहीं है कि कमेटी की रिपोर्ट के जरिए इन कंपनियों को राहत दिलाने का प्रयास हो रहा है। इसमें बैंकों को भी शामिल करने की खबर है। असल में इन तीनों कंपनियों ने अपने इस प्रोजेक्ट्स के लिए देश के कई बैंकों से भारी भरकम लोन ले रखा है। अकेले अडानी के ऊपर 19 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है। तीनों को मिला कर कुल कर 33 हजार करोड़ रुपए का है। जानकार सूत्रों का कहना है कि इन कंपनियों, बैंकों और दूसरे सभी हितधारकों ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात की थी। उसके बाद इस पूरे मामले में कमाल का ट्विस्ट आया। कर्ज देने वाले बैंकों की अगुवाई कर रही भारतीय स्टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई है, जिसमें कहा गया है कि इन पावर कंपनियों की हालत बहुत बुरी है और इसलिए अदालत या तो इन कंपनियों को बिजली की दर बढ़ाने की इजाजत दे या बैंकों को इस बात की मंजूरी दे कि वे अपने कर्ज का कुछ हिस्सा माफ कर सकें। अगर ऐसा कुछ होता है तो यह बहुत बुरी मिसाल साबित होगी क्योंकि देश की सारी पावर कंपनियां संकट में हैं और उनके ऊपर बैंकों का करीब चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। एक बार कर्ज माफ करने या दर बढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ तो बहुत भारी संकट होगा। 

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