घटनाएं कहां रूक रही?

सेना और दूसरे सुरक्षा बलों की साख पर एक बड़ा सवाल यह भी उठा है कि आखिर सितंबर 2016 और फरवरी 2019 की उसकी कार्रवाई से क्या बदल गया? सेना की कार्रवाई का सरकार ने बहुत ढोल पीटा। पहली बार हुआ कि सेना के आला अधिकारियों ने इतनी प्रेस कांफ्रेंस की। सर्जिकल स्ट्राइक करने से लेकर पाकिस्तान की कार्रवाइयों के जवाब देने के बारे में सेना ने प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई दी। पाकिस्तान के लड़ाकू विमान एफ-16 को मार गिराने के दावे के बारे में भी सेना को प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई देनी पड़ी और मिसाइल का टुकड़ा दिखाना पड़ा। इससे पहले कभी इसकी जरूरत नहीं महसूस की जाती थी। सेना के कहे पर लोग आंख मूंद कर भरोसा करते थे। सरकार ने अपनी वाहवाही के लिए, अपने 56 इंच के सीने की तारीफ के लिए सेना पर लोगों के इस भरोसे को दांव पर लगा दिया। 

सवाल है कि अगर सितंबर 2016 में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक अगर कामयाब हुई थी तो कम से कम थोड़े समय के लिए तो आतंकवादी घटनाएं थम जानी चाहिए थीं?  पर वह नहीं हुआ। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी हमले जारी रहे थे। आतंकवादियों की घुसपैठ होती रही थी और करीब आधा दर्जन बड़े आतंकी हमले हुए। सुरक्षा बलों की तलाश और मुठभेड़ भी जारी रही। सवाल है कि जब नियंत्रण रेखा के पास आतंकवादियों के सारे शिविर नष्ट हो गए तो फिर उन्होंने इतनी जल्दी कैसे अपना बेस बना लिया, घुसपैठ करते रहे और भारतीय सुरक्षा बलों को चुनौती देते रहे? दूसरे हमले को छोड़ दें तब भी पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीआरपीएफ के हमले पर हुए भीषण आतंकवादी हमले को मिसाल मान सकते हैं। तभी कई जानकार मानते हैं कि सेना की कार्रवाई प्रतीकात्मक थी, जिसे चुनावी फायदे के लिए देश के राजनीतिक नेतृत्व ने बढ़ा चढा कर पेश किया। सेना और सुरक्षा बलों की असली लड़ाई नहीं बदली है। उनकी तलाशी और मुठभेड़ अब भी जारी है। इसी क्रम में 14 फरवरी के पुलवामा हमले के थोड़े दिन बाद ही आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में एक अधिकारी सहित सुरक्षा बलों के पांच जवान शहीद हो गए। 

दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक 26 फरवरी को हुई। दावा किया जा रहा है कि बालाकोट में जैश ए मोहम्मद का पूरा बेस नष्ट कर दिया गया। इसके अलावा चकोटी और मुजफ्फराबाद में भी कार्रवाई का दावा किया जा रहा है। पर क्या उससे आतंकवादी घटनाएं रूक गई हैं? ऐसा नहीं कहा जा सकता है। सुरक्षा बलों की चुनौतियां कम नहीं हुई हैं, बल्कि और बढ़ गई हैं। सरकार और नेताओं के दावों के बाद से आतंकवादी संगठन ज्यादा सक्रिय हो गए हैं और उन्होंने सुरक्षा बलों पर ज्यादा घातक हमले शुरू कर दिए हैं। बालाकोट में वायु सेना की कार्रवाई के दो दिन बाद ही पुलवामा में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के पांच जवान शहीद हो गए। 

आतंकवादियों की हिम्मत कितनी बढ़ी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शुक्रवार को वे छुट्टी पर आए भारतीय सेना के एक जवान को अगवा करके ले गए। जम्मू कश्मीर लाइट इंफैंट्री के जवान मोहम्मद यासिन बट को आतंकवादी उठा ले गए। बडगाम के काजीपुरा इलाके के रहने वाले बट 24 फरवरी से छुट्टी पर थे। इससे पहले पिछले साल जून में आतंकवादियों ने 44 राष्ट्रीय राइफल के जवान औरंगजेब को अगवा कर लिया था और मार डाला था। पुंछ के रहने वाले औरंगजेब ईद की छुट्टी पर थे, जब उनको अगवा करके मारा गया। जाहिर है तमाम प्रचार और हल्ले के बीच जमीनी स्थिति यह है कि कश्मीर में अब भी आतंकवादियों पर लगाम नहीं कसी जा सकी है और सुरक्षा बलों के जवान शहीद हो रहे हैं। अगर नियंत्रण रेखा के पार जाकर सैन्य बलों की कार्रवाई को रूटीन के अंदाज में रहने दिया गया होता, जैसा पहले होता था तो सुरक्षा बलों की साख पर सवाल नहीं उठते। लेकिन चुनावी फायदे के लिए उसका प्रचार करके श्रेय लेने की होड़ में देश के राजनीतिक नेतृत्व ने सुरक्षा बलों की साख को बट्टा लगा दिया है।

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