बालाकोट हमले का सच क्या? वैश्विक रिपोर्टिंग की हकीकत पर क्या सोचे?

26 फरवरी को सुबह मिराज 2000 विमानों से बालाकोट में बम गिराने की खबर के बाद 11 बजे विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेस कांफ्रेंस करके एक लिखित बयान पढ़ा, जिसमें उन्होंने कहा कि वायु सेना ने बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के शिविर पर बम गिराए हैं।  उन्होंने नहीं बताया कि वायु सेना की कार्रवाई में कितने आतंकवादी मारे गए। बाद में वायु सेना प्रमुख बीरेंद्र सिंह धनोआ ने भी कहा कि वायु सेना ने अपने टारगेट को हिट किया पर इसमें कितने मरे यह गिनना वायु सेना का काम नहीं है। उन्होंने कहा कि यह बात सरकार बताएगी कि कितने आतंकवादी मारे गए। 

पर असलियत यह है कि सरकार ने आधिकारिक रूप से इस बारे में कुछ नहीं कहा है। सेना के पराक्रम पर हर जगह वोट मांग रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नहीं कहा कि कितने लोग मारे गए हैं। अगर किसी कैबिनेट मंत्री के बयान को सरकार का बयान माना जाए तो उस हिसाब से एसएस अहलूवालिया का यह कहा गौरतलब है कि कार्रवाई का मकसद आतंकवादियों को मारना नहीं था, बल्कि पाकिस्तान को यह दिखाना था कि भारत क्या कर सकता है। 

पर देश के मीडिया चैनल और भाजपा के नेताओं ने अपने अपने हिसाब से आंकड़े बताए हैं। भाजपा के प्रवक्ताओं ने भी यह संख्या बताई। कई नेता चार सौ की संख्या तक पहुंच गए। बाद में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि ढाई सौ लोग मारे गए। फिर एनटीआरओ के सूत्रों के हवाले से कहा गया कि कार्रवाई के समय तीन सौ मोबाइल फोन सक्रिय थे, इस आधार पर ढाई से तीन सौ लोगों के मारे जाने का अनुमान है। हालांकि यह बात भी सूत्रों के हवाले से कही गई है। सेना या सरकार ने मारे गए आतंकवादियों की संख्या के बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। 

तब तक सब मान रहे थे कि वायु सेना की कार्रवाई में जैश का ठिकाना नष्ट हुआ है। पर अब हैरान करने वाला खुलासा है। सेटेलाइट तस्वीरों के जरिए बताया जा रहा है कि जैश ए मोहम्मद का मदरसा और उसके बाकी ठिकाने सब अपनी जगह वैसे के वैसे हैं, जैसे 26 फरवरी से पहले थे। यानी उनको कोई नुकसान नहीं हुआ। याद करें कार्रवाई के तुरंत बाद बीबीसी और दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने क्या रिपोर्ट की थी। उन्होंने चश्मदीदों के हवाले से कहा था कि वहां कुछ दरख्त जले हैं, कुछ गड्ढे हो गए हैं और एक व्यक्ति जख्मी हुआ है। उन्होंने पहले, दूसरे दिन ही बता दिया था कि कोई बड़ी भारी तबाही नहीं मची है। उनका कहना था कि अगर बड़ी बड़ी इमारतें गिरतीं तो वहां मलबा होता, जो कि नहीं था। शवों की गिनती छोड़ दें, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को वहा मलबा भी नहीं मिला। 

उसके बाद भारत में द हिंदू अखबार ने  विस्तार से रायटर की रिपोर्ट प्रकाशित की। रायटर ने प्लैनेट लैब्स इंक की ओर से तस्वीरें जारी होने के तुरंत बाद इस पर विशेषज्ञों की राय ली थी। इन्होने पुरानी और नई तस्वीरों का विश्लेषण करके कहा कि वहां पहले से मौजूद इमारत को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 

तभी लगता है टारगेट के बारे में भी क्या गलत सूचना दी गई है? अभी तक सरकार की ओर से यह नहीं बताया गया है कि उसने हमले में किस किस्म के बम का इस्तेमाल किया। पर सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि इजराइल में बने स्पाइस 2000 ग्लाइड बम की एक हजार किलो की मात्रा का इस्तेमाल किया गया था। इसका इस्तेमाल मजबूत ढांचों को नष्ट करने के लिए होता है। इतने बम से पूरी बिल्डिंग को नष्ट हो जाना चाहिए था। पर इसका कोई संकेत वहां नहीं मिला है। तभी सवाल है कि क्या भारतीय वायु सेना के विमान टारगेट पर निशाना नहीं लगा पाए? या उनको टारगेट ही दूसरा दिया गया था, जहां हमारे जांबाज पायलट पहुंचे और बम गिरा कर वापस लौटे? 

रायटर की ओर से जारी सेटेलाइट तस्वीरें और उसका विश्लेषण भारत सहित पूरी दुनिया की मीडिया में छपा है और अभी तक सरकार या सेना की ओर से न तो इसका खंडन हुआ है और अपनी कहानी को सही बताने वाले सबूत पेश किए गए हैं। सबूत के तौर पर हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने खुद माना है कि हमला हुआ। इसमें संदेह नहीं है कि वायु सेना के विमान वहां तक गए, उसे पाकिस्तान भी मान रहा है। संदेह तो इस पर है कि वहां क्या तबाही मची, क्या नुकसान हुआ।  

अब यहीं पर सितंबर 2016 और फरवरी 2019 की सर्जिकल स्ट्राइक का फर्क दिख रहा है। पहली स्ट्राइक पाक अधिकृत कश्मीर में हुई थी और उसमें कहीं भी इसका जिक्र नहीं हुआ कि कितने आतंकवादी मारे गए। तभी जब सूत्रों के हवाले से आतंकवादियों के ठिकाने ध्वस्त होने के वीडियो जारी हुए तो लोगों ने उन पर सहज ही भरोसा कर लिया। पाकिस्तान तब भी खंडन करता रहा पर किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने पीछे पड़ कर कोई हकीकत सामने लाने का जतन नहीं किया। इस बार सारी एजेंसियां इसलिए लगीं क्योंकि दावा किया गया तीन सौ या चार सौ आतंकवादी मारे गए। इतने आतंकवादी इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिका की ओर से लगातार हुई बमबारी में भी इराक और सीरिया में नहीं मारे गए। तभी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने जांच पड़ताल की और हकीकत दुनिया को बताई। सोचें, चुनावी साल में अपने चुनावी फायदे के लिए इतनी बड़ी संख्या बता कर सरकार, उसके सूत्रों और मीडिया ने सेना की साख पर कितना बड़ा धब्बा लगाया है!

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