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यूपीए का विकास कैसे छोटा दिखे?

केंद्र सरकार ने कमाल किया है। ऐसे संभवतः इससे पहले कभी नहीं हुआ कि अतीत के आंकड़े उठा कर, नए पैमाने पर उसकी व्याख्या हो और उन आंकड़ों को गलत बता दिया जाए, जो उस समय की सरकार ने दिए थे। नरेंद्र मोदी की सरकार ने ऐसा किया है। सरकार ने बैक सीरिज डाटा की व्याख्या करते हुए बताया है कि यूपीए सरकार के समय असल में विकास दर उतनी नहीं थी, जितनी बताई गई थी। सरकार ने वित्त वर्ष 2005-06 से लेकर 2010-11 तक के पुराने आंकड़े बदल दिए हैं। बताया गया है कि 2005-06 में विकास दर 9.3 की बजाय 7.9 थी। 2006-07 में भी विकास दर 9.3 नहीं थी, बल्कि 8.1 थी। 2007-08 में 9.8 की बजाय 7.7 थी। 2008-09 में 3.9 की बजाय 3.1 थी। 2009-10 में 8.5 नहीं, बल्कि 7.9 थी और 2010-11 में 10.3 नहीं, बल्कि 8.5 थी। इन आंकड़ों के दम पर दावा किया गया है कि मनमोहन सिंह की सरकार के दो कार्यकाल में समय औसत विकास दर 6.7 फीसदी रही, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार के पहले चार साल की औसत विकास दर 7.3 रही है। 

अतीत को बदल देना किसी चमत्कार से कम नहीं होता है। सरकार ने यह चमत्कार कर दिया। जब सरकार अपने कार्यकाल में विकास दर नहीं बढ़ा सकी और नोटबंदी, जीएसटी जैसे फैसलों से विकास दर बुरी तरह से प्रभावित हुई तो उसने पिछली सरकार के विकास दर को ही घटा दिया। ताकि अपनी विकास दर ज्यादा दिखाई जा सके। एक तरह से अपनी छोटी लाइन को बड़ा बनाने के लिए पिछली सरकार की बड़ी लाइन को मिटा दिया गया। जैसा कि विपक्षी पार्टियां दावा कर रही हैं यह काम नीति आयोग ने किया है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने खम ठोंक कर दावा भी किया है कि विकास दर का आकलन करने के लिए हमने नई मेथोडोलॉजी का इस्तेमाल किया है, जो पिछली मेथोडोलॉजी से बेहतर है। इस तरह सरकार ने एक नया रास्ता खोल दिया है कि आगे आने वाली सरकारें किसी कथित मेथोडोलॉजी के दम पर पिछले आंकड़ों में हेराफेरी कर सकेगी। सवाल है कि ऐसे में दुनिया भर में भारत के आंकड़ों की क्या साख रह जाएगी। वैसे भी इस सरकार ने आते आते विकास दर के आकलन के जो पैमाने बदले उससे ही आंकड़ों की साख पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब भारत के आंकड़ों को कई जगह उसी तरह फर्जी माना जाने लगा है, जैसे नब्बे के दशक में रूस के आंकड़ों का माना जाता था। 

भारत सरकार ने अतीत को बदलने का जो चमत्कार किया है उस पर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाईवी रेड्डी का बयान गौरतलब है। उन्होंने कहा है – पूरी दुनिया में भविष्य को अनिश्चित माना जाता है पर भारत में तो अतीत भी अनिश्चित है। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अखबारों में से एक वाल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा है – भारत ने पुनर्गणना से हासिल अपने ऐतिहासिक आर्थिक आंकड़ों की फिर से पुनर्गणना की है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले की विकास दर को कम कर दिया है ताकि अपने आंकड़ों को बेहतर बताया जा सके। ध्यान रहे इसी साल अगस्त में पुराने आंकड़ों की पुनर्गणना हुई थी और इसी सरकार ने बताया था कि यूपीए के दो कार्यकाल में औसत विकास दर 7.7 फीसदी रही थी, जबकि मोदी सरकार की औसत विकास दर 7.35 फीसदी रही है। पर तीन महीने में ही सरकार ने नई मेथोडोलॉजी के जरिए फिर पुनर्गणना कर दी और बता दिया कि मनमोहन सिंह की सरकार के समय औसत विकास दर 6.7 फीसदी थी। यानी तीन महीने में सरकार ने यूपीए की सरकार के विकास आंकड़ों में एक फीसदी की कमी कर दी। 

सरकार हो चुकी चीजों को बदल रही है और इस बात को गलत साबित कर रही है कि अतीत को बदला नहीं जा सकता। इसकी कई मिसाल दिख जाएगी। पिछले दिनों केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने नोटबंदी को लेकर नए आंकड़े और नई रिपोर्ट जारी की। पहले मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नोटबंदी का किसानों पर बड़ा असर पड़ा था और उन्हें खाद, बीज खरीदने में बड़ी परेशानी उठानी पड़ी थी। जब विपक्ष ने इस रिपोर्ट का इस्तेमाल सरकार को घेरने के लिए करना शुरू किया तो कृषि मंत्रालय ने एक नई रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा है कि नोटबंदी का किसानों पर कोई बुरा असर नहीं हुआ था। 

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