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राहुल नेता बने पर वोट वाले नहीं!

मैंने 2015 में अपन तो कहेगें में ‘घर बैठे राहुल को मिलेगी सत्ता!’ (13 फरवरी 2015) शीर्षक से लिखा था कि जब वक्त आएगा तो जनता अपने आप जंगल में खोए राजकुमार की तरह राहुल गांधी को पाएगी और कांग्रेस फिर जिंदा हो जाएगी। सो यदि आज राहुल गांधी की कमान में कांग्रेस जीतती लग रही है तो वह जनता का खोजना है। जनता का मोहभंग मोदी राज और भाजपा सरकारों से है तो राहुल गांधी नेता बने है। मगर उनसे वोट नहीं है। 

उन्हे नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने बनाया है और जनता उन्हे डिफाल्ट नेता के चलते सुनने को आतुर है। लोगों में राहुल गांधी को ले कर कौतुक इसलिए है क्योंकि वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ मर्दानगी से बोल रहे है। उनका नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेबाक बोलना लोगों में हिट है। राफेल और अंबानी-अदानी के खिलाफ राहुल गांधी की बेबाकी हर तरह के वर्ग में हिट है। किसान, नौजवान और मध्य वर्ग सबमें आर्थिक दिक्कतों के चलते अंबानी-अदानी के किस्से राहुल गांधी की पूंजी है। वामपंथी हो या दक्षिणपंथी मध्यवर्गी सभी में मोदी और अंबानी-अदानी का नैरेटिव राहुल गांधी की यह इमेज बना गया है कि कितना हिम्मती है यह नेता। कोई तो है जो बिना डरे बोल रहा है। 

लेकिन क्या इससे राहुल गांधी वोट दिलाने वाली शख्शियत बने है? अभी तो नहीं। वे विरोध के प्रतीक है। मोदी-शाह के खिलाफ खड़े हो सकने के प्रतीक है लेकिन उनका वोट पड़वाने का जादू नहीं है। बावजूद इसके कांग्रेसियों और खासकर राहुल गांधी के करीबियों में मुगालता बना है कि विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ माहौल है तो वह राहुल गांधी की लोकप्रियता से है। तभी मध्यप्रदेश के बाद राजस्थान में भी कांग्रेस के ऐसे हार्डिंग दिखलाई दिए जिसमें राहुल गांधी का नरेंद्र मोदी की तरह आदमकद फोटो और बगल में अशोक गहलौत व सचिन पायलट, रामेश्वर ढूढी और अविनाश पांडे के फोटो। मध्यप्रदेश में राहुल गांधी के फोटो के साथ प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया का भी फोटो! 

मतलब राहुल गांधी ने बतौर अध्यक्ष नौजवान पदाधिकारियों की जो टीम बनाई है उसमें गलतफहमी की हद है जो राजस्थान में प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे और मध्यप्रदेश में प्रभारी महासचिव दीपक बाबरियां की फोटो से मतदाताओं में अपील होने की गलतफहमी पाली गई। मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों जगह भाजपा के हार्डिंग में शिवराजसिंह चौहान या वसुंधरा राजे का चेहरा मतदाताओं का ध्यान खींचने के लिए था वहीं कांग्रेस के हार्डिंग में राहुल गांधी, अविनाश पांडे, दीपक बाबरियां, कमलनाथ, रामेश्वर ढूंढी के चेहरें। 

सो कांग्रेस में मोटी सोच है कि पोस्टर-हार्डिंग से कांग्रेस में नई पीढ़ी का टेकऑवर जनता के बीच पैंठाया जाए। कांग्रेस की जीत का सेहरा राहुल गांधी के सिर पर तो साथ में उनके चुने पठ्ठों पर भी। इसमें हर्ज नहीं है लेकिन जैसा मैंने पहले लिखा है कि विपक्ष में रहते हुए पुराने स्थापित नेताओं को हाशिए में डाल जनता में जमवाना कुल मिला कर घातक होता है। अपना मानना है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस जीतेगी तो जनता की नाराजगी के बीच दिग्विजयसिंह की बिसात से और राजस्थान में अशोक गहलौत की लोगों में पहचान के चलते न कि दीपक बाबरिया या अविनाश पांडे के चलते।

इससे भी अंहम हकीकत जनता के द्वारा खोए राजकुमार को ढूंढा जाना है। उसे मोदी-शाह ने अपनी करनियों से जनता के बीच पहुंचवाया और जनता ने उसे बतौर राजकुमार स्वीकार लिया।  तीनों हिंदी भाषी राज्यों में विधानसभा चुनाव पूरी तरह मोदी सरकार और प्रदेश सरकारों से पांच साल में हुए अनुभव ( इनमें भी मुख्यतः आर्थिक परेशानियों के अनुभव) पर है। जनता का गुस्सा है और विकल्प के नाते सामने सिर्फ कांग्रेस है तो उसे वोट मिला है। सो जीत हुई तो बाई डिफाल्ट है। छतीसगढ़ में अजित जोगी-बसपा एलायंस का विकल्प था लेकिन आदिवासी-दलित मामले में आज की हकीकत क्योंकि भाजपा के खिलाफ सघन गुस्सा है तो दलित वोट जाया करने के मूड में नहीं है। इसलिए वहां भी डिफाल्ट में कांग्रेस का जलवा है।

जो हो, ग्यारह दिसंबर के बाद राहुल गांधी की बड़ी परीक्षा है। कांग्रेस की जीत या हार के बीच उनके फैसले बताएगें कि लोकसभा चुनाव की आगे की तैयारियां वे मुगालतों में करेगें या समझदारी में? जीत से अंहकारी बनेगें या विन्रम और व्यवहारिक? 

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