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तेलंगाना में गठबंधन का दांव?

वैसे तो पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और भाजपा की नजर से देखें तो सबसे ज्यादा अहम चुनाव मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के हैं। पर अगले लोकसभा चुनाव और विपक्ष के महागठबंधन के प्रयासों के नजरिए से देखें तो तेलंगाना का चुनाव सबसे अहम है। वह एकमात्र राज्य है, जहां विपक्ष का गठबंधन बन पाया है। सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति के सामने कांग्रेस ने अपने धुर विरोधी और चिर प्रतिद्वंद्वी टीडीपी से हाथ मिलाया। कांग्रेस और टीडीपी दोनों मिल कर तेलंगाना में लड़ रहे हैं और उन्होंने साथ ही तेलंगाना जन सेना और सीपीएम को साथ लेकर प्रजाकुटामी यानी महागठबंधन बनाया है। अगर यह महागठबंधन सफल होता है तो इसकी तर्ज पर देश भर में गठबंधन बन सकता है। चंद्रबाबू नायडू ने पिछले चुनाव में 15 सीटें जीती थीं पर वे इस बार सिर्फ 13 सीटों पर लड़ रहे हैं। कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए उन्होंने के लिए उन्होंने कम सीटों पर लड़ने का फैसला किया। 

बहरहाल, इस महागठबंधन ने टीआरएस की संभावनाओं पर ग्रहण लगाया है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने लोकसभा चुनाव के समय होने वाले ध्रुवीकरण की संभावना से घबरा कर समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने का दांव चला था। पर वह दांव उलटा पड़ता दिख रहा है। महागठबंधन की बढ़ती ताकत से परेशान होकर राव ने हैदराबाद तक सीमित रहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम से अंदरखाने तालमेल किया है। दोनों का मकसद राज्य में कांग्रेस को रोकने का है। इसके लिए ध्रुवीकरण कराने वाले बयान दिए जा रहे हैं और मुस्लिम वोट में बंटवारे का प्रयास हो रहा है। इसे रोकने के लिए कांग्रेस ने मतदान से एक हफ्ते पहले पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरूद्दीन को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। 

अगर पिछले चुनाव के आंकड़ों को देखें तो पहली नजर में प्रजाकुटामी की स्थिति मजबूत दिखती है। 2014 के चुनाव में जब राज्य का बंटवारा हुआ था और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना का विवाद चरम पर था तब टीडीपी को 15 सीटें मिली थीं। कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं। विभाजन के बाद हुए पहले चुनाव में भी केसीआर की पार्टी को बहुत मामूली बहुमत मिला था। 119 सदस्यों की विधानसभा में उनको 63 सीटें मिली थीं। अगर वोट प्रतिशत के हिसाब से देखें तो 2014 में तेलंगाना राष्ट्र समिति को करीब 35 फीसदी वोट मिले थे। उसके मुकाबले कांग्रेस को 257 फीसदी यानी करीब दस फीसदी कम वोट मिले थे। पर भाजपा की मौजूदा सहयोगी टीडीपी को उस समय 12 फीसदी के करीब वोट मिले थे। यानी कांग्रेस और टीडीपी का वोट मिला कर 37 फीसदी होता है। टीआरएस से ज्यादा। इसके अलावा इन दोनों के गठबंधन में जन सेना और कम्युनिस्ट पार्टियां भी हैं। पिछली बार सीपीआई और सीपीएम दोनों ने एक-एक सीट जीती थी। 

कांग्रेस और टीडीपी की संभावना बेहतर होने का एक कारण यह है कि जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस इस बार तेलंगाना में चुनाव नहीं लड़ रही है। पिछली बार जगन की पार्टी के चार विधायक जीते थे और उनको चार फीसदी के करीब वोट मिले थे। उनके नहीं लड़ने से यह वोट कांग्रेस की ओर जाने की संभावना है। भाजपा पिछली बार टीडीपी के साथ गठबंधन  में लड़ी थी, पर इस बार वह अकेले लड़ रही है। इसलिए भी वोटों का बंटवारा होना तय है। इस वजह से महागठबंधन की संभावना बेहतर होने का अंदाजा लगाया जा रहा है। 

तेलंगाना में यह तय माना जा रहा है कि सीमांध्र के इलाके में टीडीपी और वाईएसआर दोनों के समर्थक टीडीपी और कांग्रेस को वोट करेंगे। टीआरएस और भाजपा के मिले होने के प्रचार की वजह से हैदराबाद को छोड़ कर बाकी प्रदेश में मुस्लिम वोट एकमुश्त महागठबंधन में जाने की संभावना है। इसके अलावा केसीआर के परिवार में नेतृत्व को लेकर विवाद चल रहा है। उन्होंने अपने बेटे केटी रामाराव को आगे किया है तो भतीजे हरीश राव के समर्थक चुनाव में ज्यादा जोर नहीं लगा रहे हैं, जिससे चुनाव प्रचार प्रभावित हुआ है।

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