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भाजपा संगठन तब और अब

पांच साल पहले भाजपा के चुनाव अभियान समिति के प्रमुख के तौर पर नरेंद्र मोदी ने जब राष्ट्रीय राजनीति मंय अपनी दूसरी पारी शुरू की थी तब उनको पार्टी का जो संगठन मिला था और अब पांच साल बाद उन्होंने जो संगठन बनाया है, उसका फर्क ही बदले हुए वक्त को बताने वाला है। जब मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर कांग्रेस से लड़ने उतरे थे तब उनके पास भाजपा के दिग्गज नेताओं की फौज थी। राजनाथ सिंह अध्यक्ष थे तो नितिन गडकरी पूर्व अध्यक्ष के रूप में पूरी तरह से सक्रिय थे। चाहे लालकृष्ण आडवाणी हों या मुरली मनोहर जोशी या अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, उमा भारती, वेंकैया नायडू ये तमाम नेता भाजपा की सरकार बनाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे थे। 

पांच साल पहले उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह से लेकर विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह, कलराज मिश्र, लालजी टंडन जैसे दर्जन भर नेता थे। बिहार में सीपी ठाकुर, सुशील मोदी, नंद किशोर यादव, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता जी जान से लड़ रहे थे। महाराष्ट्र में गोपीनाथ मुंडे ने पार्टी की कमान संभाली थी तो दिल्ली में सबसे लोकप्रिय डॉक्टर हर्षवर्धन पार्टी को चुनाव लड़ा रहे थे। उत्तराखंड में भुवन चंद्र खंडूरी, रमेश पोखरियाल निशंक और भगत सिंह कोश्यारी ने कमान संभाली थी। हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल पार्टी को चुनाव लड़ा रहे थे तो हरियाणा में कैप्टेन अभिमन्यु, रामबिलास शर्मा और अनिल विज की कमान थी। 

तब के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की टीम में अमित शाह महासचिव थे। वे उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। वरुण गांधी महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी थे। राजनाथ सिंह ने धर्मेंद्र प्रधान और राजीव प्रताप रूड़ी को महासचिव बनाया था। प्रभात झा और उमा भारती को उपाध्यक्ष बनाया गया था। इनके अलावा बलबीर पुंज, स्मृति ईरानी, मुख्तार अब्बास नकवी, सीपी ठाकुर को उपाध्यक्ष बनाया गया था। 

राजनाथ सिंह की टीम के महासचिवों की तुलना अमित शाह के महासचिवों से करें तो तस्वीर और साफ होती है। राजनाथ की 2013 में बनाई गई टीम में महासचिव थे – अनंत कुमार, थावरचंद गहलोत, जेपी नड्डा, अमित शाह, वरुण गांधी, धर्मेंद्र प्रधान, मुरलीधर राव, राजीव प्रताप रूड़ी आदि। अमित शाह की टीम में सात महासचिव हैं, जिनमें एकाध को छोड़ कर बाकी की गतिविधियों का अंदाज लगाना मुश्किल है। शाह के महासचिव अरुण सिंह, अनिल जैन, सरोज पांडेय आदि अपने दम से नहीं, पार्टी अध्यक्ष और प्रधानंमत्री के नाम पर राजनीति करने वाले हैं। 

भाजपा के पास हमेशा अच्छे प्रवक्ताओं की टीम रही है। खुद नरेंद्र मोदी किसी जमाने में टेलीविजन की बहसों में हिस्सा लिया करते थे। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, गोविंदाचार्य आदि भाजपा के प्रवक्ता रहे हैं। राजनाथ सिंह ने भी इसी परंपरा में प्रकाश जावडेकर, निर्मला सीतारमण, शाहनवाज हुसैन, मीनाक्षी लेखी, सुधांशु त्रिवेदी, कैप्टेन अभिमन्यु को प्रवक्ता बनाया। अब भाजपा के प्रवक्ता के रूप में हर जगह सिर्फ संबित पात्रा दिखते हैं। मीडिया के प्रभारी अनिल बलूनी को बनाया गया है। सुधांशु त्रिवेदी, शाहनवाज हुसैन और मीनाक्षी लेखी अब भी प्रवक्ता हैं पर टेलीविजन पर इनकी मौजूदगी मामूली ही होती है। 

नितिन गडकरी ने पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद इसका कायाकल्प किया था। पार्टी के 11, अशोक रोड स्थित तब के मुख्यालय में कई नए निर्माण हुए थे। पार्टी के मोर्चा और प्रकोष्ठ के प्रभारियों के लिए बैठने की जगह बनी थी। मोर्चा के अलावा दो दर्जन प्रकोष्ठ बने थे, जिनसे पार्टी के ढेर सारे नेताओं को जोड़ा गया था। राजनाथ सिंह ने इसे थोड़े बहुत फेरबदल के साथ बनाए रखा था। पर अमित शाह ने सारे प्रकोष्ठ भंग कर दिए। उन प्रकोष्ठों में रहे नेता एक तरह से बेरोजगार हो गए हैं। 

इस बीच पार्टी का नया मुख्यालय बन गया। दीनदयाल उपाध्याय रोड पर कारपोरेट ऑफिस की तरह पार्टी का कई मंजिल का मुख्यालय बना है, जहां ढेर सारे कमरे भी बने हैं। पर वहां बैठने वाले गिने चुने लोग हैं। कारपोरेट या सरकारी दफ्तर की तरह पत्रकारों को भी पास दिखा कर और आने का कारण बता कर अंदर जाना होता है। 11, अशोक रोड में जहां सारे दिन चहल पहल रहती थी और लोगों का आना जाना रहता था उसके उलट दीनदयाल रोड पर सन्नाटा रहता है। पार्टी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री के जाने का कार्यक्रम हो तो वहां हलचल दिखती है। पार्टी का दफ्तर नेताओं, कार्यकर्ताओं की पहुंच से भी दूर हो गया है।

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