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मोदी सरकार के बस में ढाई रू.!

सब तरफ कयास है कि चुनाव आते-आते नरेंद्र मोदी और अमित शाह कमाल करेंगे। ऐसा कमाल जिसकी फिलहाल कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मतलब अभी भले मोदी-शाह का ग्राफ लुढ़का हुआ है लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी का ग्राफ जंप मारेगा और फिर मोदी की सुनामी बनेगी!  सवाल है ऐसे कयास में क्या-क्या संभव है? जानकारों ने कई तरह की अटकलें लगाई हुई है। जैसे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा। पाकिस्तान से लड़ाई होगी। जम्मू-कश्मीर में धारा 377 खत्म होगी। पेट्रोल-डीजल के दाम जीएसटी में ला कर उन्हे 50 या 55 रुपए प्रति लीटर ला दिया जाएगा। 

अपना मानना है कि इनमें से एक काम नहीं होना है। इसलिए क्योंकि बतौर प्रधाननंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार में ऐसा कोई काम करने का न अब बूता है और न स्थितियां है। जब अच्छा समय था तब समझ नहीं थी तो अब कैसे हो जाएगी? चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के वक्त जब अदालती फैसले जल्दी नहीं कराए जा सके तो अब तो यों भी चुनावी माहौल हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपना पीएमओ, सीबीआई, ईडी नहीं संभल रहे है तो न सुप्रीम कोर्ट संभलना है। ऐसे ही न आर्थिकी संभलनी है और न राफेल का भ्रष्टाचार हल्ला संभलना है और न जातियो का जमीन पर चल रहा दंगल खत्म होना है। 

उस नाते सोचे तो अनुमान लगाए जा रहे तरीकों पर नरेंद्र मोदी-अमित शाह के लिए काम करना बस में नहीं है। मगर हां, इनके बस में है यूपी में हिंदू बनाम मुस्लिम करा देना। दो ही मुद्दे है जिन पर नरेंद्र मोदी-अमित शाह जनवरी तक देश का नैरेटिव मतलब हिंदूओं के बीच ब्रांड मोदी को फिर छप्पन इंची छाती का बना सकते है। वह उत्तर प्रदेश की प्रयोगशाला से ऐसा कुछ करना है जिससे हिंदू-मुस्लिम भभका ज्वालामुखी की तरह फूट जाए। उत्तर प्रदेश इपीसेंटर होगा और उसके केंद्र से झटकों की जितनी तीव्रता फैलेगी उतना चुनावी माहौल बदलेगा। 

इसका घटनाक्रम कुछ भी हो सकता है। अयोध्या में जबरदस्ती मंदिर बनवाने की गतिविधियां हो, आंदोलन हो, हिंदू-मुस्लिम दंगा हो, किसी हिंदू नेता को गोली लगे या कोई किसी हिंसा में मर जाए तो एकदम पासा पलट सकता है। याद करे 2014 के वक्त को। कैसे उत्तर प्रदेश से वह नैरेटिव बना कि हिंदू परिवार पलायन करने को मजबूर हुए।

सो जो सोचा जा रहा है, जिन बातों की अटकले है उनमें से कुछ नहीं होना है। होगा वह जिसकी कल्पना भी नहीं है? यों इसमें सब तरफ फैली एक अटकल ईवीएम मशीनों की भी है। मैं ईवीएम मशीन की बात नहीं मानता रहा हूं। मगर दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव के वक्त जब पता पड़ा कि ईवीएम मशीन को सप्लाई करने वाली सरकारी कंपनियां जब ईवीएम अलग-अलग तरह की बनाती है और किसी में सौ फिसद सच्चे नतीजे की गारंटी नहीं हो सकती है तो मुझे भी तब शंका के साथ लिखना पड़ा कि यह तो बहुत गड़बड़!

उस नाते मोदी-शाह का तानाबाना ब्रांड मोदी की छप्पन इंची छाती, दूसरा कोई विकल्प नहीं, पप्पू या मायावती को चुनेगे या नरेंद्र मोदी की धुरी वाला होगा।  हिंदूपरस्त मोदी को चुनेंगे या मुस्लिमपरस्त?  ऐसे सवालों के हल्ले से ही सुनामी पैदा करने और उनके साथ नीचे बूथ स्तर का प्रबंधन अहम होगा।  

तब ढाई रुपए तेल-डीजल सस्ता करने, किसानों के लिए खरीद मूल्य बढ़ाने या आयुष्मान भारत, आंगनवाड़ी महिलाओं की मानद राशि बढ़ाने जैसे झुनझुनों पर नरेंद्र मोदी क्यों अपने आपको दिन रात खंपाएं हुए है? इसलिए कि इन झुनझुनों से ही तो प्रचार को फीड मिली हुई है। यदि यह भी न हो तो फिर आर्थिकी, सामाजिकी, राजनीति का डुबना ही चर्चा में छाया रहेगा। हकीकत पर लेप के ये झुनझुने और टोटके है। 

इनका कोई असर नहीं होना है। अपनी थीसिस है कि इससे उलटे नुकसान है। आखिर किसान हो या मध्यवर्ग सब दिन-प्रतिदिन का अनुभव लिए हुए है कि फसल की खरीद होती कहां है जो घोषित ज्यादा मूल्य का मतलब बने? रपट है कि इस दफा यूपी में धान और गन्ने दोनों की फसल ठीक है। अब यदि ऐसा है तो दिसंबर में यूपी सरकार को मंडियों में जमकर खरीद करवानी चाहिए। वैसा होगा नहीं। नतीजतन किसान का अनुभव लगातार बिगड़ा रहेगा। ऐसे ही डीजल के दाम आसमान पर है तो खेती में पंप-सिंचाई उपयोग में किसान पर क्या गुजर रही होगी? उसमें ढाई-पांच रुपए की कटौती से क्या बनना है? जले में नमक छिड़कना है।

हां, पूरा देश जाने हुए है कि मोदी सरकार ने दुनिया में सस्ती रेट के बीच भी भारत की जनता को महंगा पेट्रोल-डीजल बेचा। 12 लाख करोड़ रुपए (कुछ जानकारों के अनुसार 15 लाख करोड रुपए) जनता की जेबों से ले कर सरकारी खजाने में भरा। अब ढाई रुपए प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी घटा, साढ़े दस हजार करोड रुपए की रियायत से लोग झांसे में आए यह संभव नहीं लगता। मगर इस पर भी अमित शाह की यह वाहवाही बनाना जले पर नमक है कि देखों, देखों मोदी सरकार जनता के प्रति कितनी संवेदनशील है। यह सब विनाशकाले विपरित बुद्वी के लक्षण है। दिक्कत यह है कि इसके अलावा मोदी-शाह के पास और कुछ करने को है ही नहीं। आर्थिकी का इतना दिवाला निकाल चुके हैं और प्रोपेगेंडा व हकीकत में इतनी खाई बना दी है कि ढाई रुपए की राहत, किसान को एमएसपी जैसे झुनझुनों के अलावा पिटारे में कुछ बचा नहीं है। 2014 का जादुई पिटारा पूरी तरह खाली है। 

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