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अब खजाना लुटाने के नुस्खे

सरकारें चुनाव से पहले मतदाताओं को पटाने के लिए लोक लुभावन फैसले करती हैं। खजाना खोलती हैं और खुले हाथ से पैसे लुटाए जाते हैं। हालांकि ऐसा करने के बावजूद सत्तारूढ़ पार्टियां चुनाव हारती रही हैं पर इस तरीके को आजमाना छोड़ती नहीं हैं। पहले ऐसा लग रहा था कि नरेंद्र मोदी इसके अपवाद होंगे। आखिर उन्होंने साढ़े चार साल तक जनता के लिए जी तोड़ काम किया है। उनके भक्त बताते हैं कि उन्होंने कोई छुट्टी नहीं ली, 18 घंटे काम किए, वे खुद भी अपने को कामदार और बाकी सबको नामदार बताते हैं। उनका दावा है कि 66 साल में जो नहीं हुआ वह उन्होंने चार साल में कर दिया। तभी ऐसा लग रहा था कि वे अब आराम से बैठेंगे और लोगों से कहेंगे कि उनके काम के आधार पर लोग उनको वोट दें। 

पर उलटा हो रहा है। साढ़े चार साल तक कथित तौर पर लोक कल्याण के कार्यों का रिकार्ड बनाने वाली नरेंद्र मोदी सरकार खजाने का मुंह खोल कर, पैसे लुटा कर मतदाताओं को ‘खरीदने’ का पुराना आजमाया हुआ और कई बार पिट चुका दांव चल रहे हैं। उनकी सरकार ने पिछले एक महीने में आधा दर्जन ऐसे फैसले किए हैं, जिनसे देश की आर्थिक दशा और बिगड़ने वाली है, जिनसे सरकार के खजाने पर बोझ पड़ने वाला है, जिनसे विकास की गतिविधियां ठप्प होने वाली हैं। पर हार्वर्ड के ऊपर हार्डवर्क और नामदारों के ऊपर कामदारों की सरकार चलाने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी खजाना लुटाने में लग 
गए हैं। 

कुछ दिन पहले ही सरकार के मंत्रियों और भाजपा के नेताओं ने कहा कि पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने में हमारा कोई हाथ नहीं है। एक मंत्री ने तो यहां तक कहा कि सरकार का कोई लेना देना नहीं है। पर जैसे ही चुनाव नजदीक आया सरकार का लेना देना निकल आया। खुद वित्त मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस करके ऐलान किया कि सरकार उत्पाद शुल्क में डेढ़ रुपए की कमी कर रही है और पेट्रोल कंपनियों से कहा गया है कि वे एक रुपया दाम घटाएं। वित्त मंत्री ने बताया कि उत्पाद शुल्क घटाने से चालू वित्त वर्ष के बचे हुए छह महीने में साढ़े दस हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ सरकार पर पड़ेगा। भाजपा ने अपने शासन वाले सभी राज्य सरकार को भी दाम घटाने को कहा। अब यह भी उम्मीद की जा रही है कि हर दिन दाम बढ़ना भी रूक जाएगा क्योंकि दो महीने में पांच राज्यों के चुनाव होने हैं। सरकार ने इसी तरह के कर्नाटक चुनाव के समय 19 दिन तक दाम बढ़ना रूकवा रखा था। 

जिस दिन सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम घटवाए उसके एक दिन बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक समीक्षा नीति की घोषणा की और सबको हैरान करते हुए नीतिगत ब्याज दरों को जस का तस रखा। देश भर के आर्थिक जानकारों का आकलन था कि आरबीआई ब्याज दर बढ़ाएगा क्योंकि पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ रहे हैं और महंगाई बढ़ने का अनुमान है। पर आरबीआई ने ब्याज दरें नहीं बढ़ाई। उलटे नोटबंदी के बाद से मशहूर हुए आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने रुपए के गिर कर न्यूनतम स्तर पर पहुंचने को भी न्यायसंगत ठहरा दिया। पिछले ही महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े भारी जलसे में आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत की, जिसके तहत 10 करोड़ परिवारों के लिए पांच लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सेवा शुरू हो गई है।

एक अक्टूबर को आठ राज्यों के किसान दिल्ली पहुंचे थे। पहले तो सरकार ने उनको सीमा पर रोका, पुलिस ने उनके ऊपर लाठियां चलाईं, पानी की बौछारें डाली और आंसू गैस के गोले छोड़े। फिर उनको दो अक्टूबर की आधी रात के बाद दिल्ली आने दिया गया और इसके अगले ही दिन केंद्र सरकार ने रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में अच्छी खासी बढ़ोतरी कर दी। इससे कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर की आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से नरेंद्र मोदी एप के जरिए संवाद किया था। उसी दौरान उन्होंने उनको मिलने वाले वेतन, भत्ते या मानदेय में बढ़ोतरी का ऐलान किया। कई सेवाओं के लिए यह मानदेय दोगुना कर दिया गया है। 

सो, पेट्रोल-डीजल के दाम घटा कर, ब्याज दर स्थिर रख कर, आयुष्मान भारत शुरू करके, न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा कर और आशा-आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय दोगुना करके सरकार ने कई समूहों को खुश किया है। ऐसा नहीं है कि यह प्रक्रिया यहीं पर रूकनी है। आगे और समूहों को खुश करने वाले उपाय होंगे। सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी घोषणा होगी, किसानों के लिए कुछ और घोषणाएं हो सकती हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकार खजाना लुटाने का चुनावी उपाय सिर्फ मतदाताओं के लिए कर रही है। सरकार अपना खजाना लुटा कर घोटालों, गड़बड़ियों को ढकने और दिवालिया हो रही कंपनियों को बचाने का प्रयास भी कर रही है। सारी गड़बड़ियों को कम से कम चुनाव तक ढके रहने का प्रयास हो रहा है। तभी सरकार ने दिवालिया हो रहे बैंक आईडीबीआई में भारतीय जीवन बीमा निगम से 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदवाई। इसी तरह 91 हजार करोड़ रुपए के कर्ज में डूबी कंपनी आईएलएंडएफएस को बचाने के काम में भारतीय जीवन बीमा निगम और भारतीय स्टेट बैंक को लगाया गया है। ध्यान रहे ये दोनों भारत सरकार से सबसे बड़े, सबसे विश्वसनीय और सबसे अधिक नकदी वाले वित्तीय संस्थान हैं, जिनके सहारे डूब रही कंपनियों को बचाने का प्रयास हो रहा है। 

सरकार की कोशिश है कि किसी तरह सारा मामला लोकसभा चुनाव तक दबा रहे। क्योंकि अभी वित्तीय संस्थान दिवालिया होते हैं तो विपक्ष उसका बड़ा मुद्दा बनाएगा। 

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