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सियासी, कानूनी उपायों का सहारा

पहले की सरकारें भी चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक उपाय करती थीं। यह पिछले 70 साल में भारत में स्वीकार कर ली गई परंपरा है कि पार्टियां और खास कर सत्ता में बैठी पार्टी आचार्य चाणक्य के सुझाव चार उपायों - साम, दाम, दंड और भेद को आजमाती हैं। पर अभी सत्ता में बैठी पार्टी दूसरी किसी भी पार्टी के मुकाबले इन उपायों को ज्यादा आजमाती दिख रही है या कम से कम पार्टी की ओर से ऐसा प्रचार किया गया है कि वह जंग में सब कुछ जायज मानती है और राजनीतिक फायदे के लिए कोई भी उपाय करेगी। 

सो, भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार तीन तरह से राजनीतिक उपाय कर रही है। पहला उपाय तो यह है कि भाजपा और उसके नेतृत्व वाले एनडीए के खिलाफ बनने वाले महागठबंधन को बनने नहीं दिया जाए या उसे कमजोर किया जाए। दूसरा उपाय यह है कि सरकार को नुकसान पहुंचाने वाली बातों, घटनाओं को किसी तरह के लोगों के बीच आने से रोका जा और जो घटनाएं लोगों के बीच आ गई हैं उनके प्रति लोगों की धारणा बदली जाए। और तीसरा उपाय, अपना गठबंधन बढ़ा बनाने और तीसरा मोर्चा बनाने का है। 

भाजपा के खिलाफ गठबंधन का पहला प्रयोग बिहार में हुआ था। तब राजद, जनता दल यू और कांग्रेस मिल कर लड़े थे। उस समय भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की सुनामी आई मान रही थी इसलिए उसने गठबंधन को होने से रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। जब चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई तब से ऐसा लग रहा है कि भाजपा ने तय किया है कोई भी ऐसा गठबंधन नहीं बनने देना है। पता नहीं भाजपा सचमुच गठबंधन होने से रोकने के लिए विपक्षी पार्टियों के नेताओं को डराना, धमकाना या पैसे देने का काम कर रही है या नहीं पर कम से कम राजनीतिक हलके में यह प्रचार है कि भाजपा ऐसा कर रही है।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ तालमेल से इनकार कर दिया। माना जा रहा है कि किसी किस्म के दबाव या लालच में उन्होंन ऐसा किया है। इसी तरह कहा जा रहा है कि झारखंड में हेमंत सोरेन की पार्टी कांग्रेस और जेवीएम से तालमेल नहीं करेगी। यह भी दावा किया जा रहा है कि टीडीपी और कांग्रेस का तालमेल नहीं होना है। हर दिन प्रादेशिक क्षत्रपों के खिलाफ नए मुकदमे होने या मुकदमों से राहत मिलने की खबरों का प्रचार हो रहा है। यह माना जा रहा है कि सरकार किसी हाल में विपक्ष को एकजुट नहीं होने देगी। मायावती से लेकर स्टालिन और शरद पवार तक के ऊपर दबाव होने की खबर है।

इसी दबाव या लालच के जरिए सरकार दूसरा उपाय कर रही है। माना जा रहा है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने राफेल विमान सौदे के बारे में जो बयान दिया और नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी वह ऐसे ही किसी उपाय का नतीजा है। सरकार अपने बारे में धारणा ठीक कराने में लगी है। वायु सेना के प्रमुख बीएस धनोआ का बयान भी इसी राजनीतिक उपाय का एक हिस्सा दिख रहा है। उन्होंने राफेल विमान सौदे का खुल कर बचाव किया। कहा कि राफेल का आना भारतीय वायु सेना के लिए बूस्टर डोज होगा और इससे दक्षिण एशिया में हवाई ताकत का संतुलन बदल जाएगा। यह संभवतः पहला मौका है कि विवादों में घिरे किसी रक्षा सौदे के पूरा होने से पहले सेना के शीर्ष अधिकारी उसका बचाव करने लगें। 

तीसरा राजनीतिक उपाय अपना गठबंधन मजबूत करने और दूसरी पार्टियों से नेताओं को तोड़ कर अपने को मजबूत करने का है। भाजपा यह खेल बहुत कायदे से खेलती रही है। तभी आज उसके पास शिव सेना और कांग्रेस में दिग्गज रहे नारायण राणे हैं तो तृणमूल कांग्रेस के नंबर दो नेता रहे मुकुल रॉय भी हैं। भाजपा ने मुकुल रॉय को काफी समय तक किनारे रखने के बाद अब प्रदेश में चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया है। भाजपा ने इसके साथ ही हर जगह पार्टियों में बगावत कराने और तीसरा मोर्चा बनवाने की राजनीति शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश में शिवपाल यादव की सक्रियता के पीछे भाजपा का हाथ बताया जा रहा है कि शंकर सिंह वाघेला के फिर ताल ठोंक कर लोकसभा चुनाव की तैयारी करने के पीछे भी भाजपा का हाथ देखा जा रहा है। 

सरकार अपने चुनावी फायदे के लिए कानून का रास्ता भी अख्तियार कर रही है। हाल में सरकार ने एससी, एसटी उत्पीड़न रोकथाम कानून में बदलाव करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। केंद्र सरकार ने कानून बना कर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा। इसी तरह तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आगे बढ़ कर सरकार ने अध्यादेश के जरिए तीन तलाक बोलने को दंडनीय अपराध बना दिया है। 

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