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प्रदेशों में भाजपा अनजाने चेहरों के सहारे 

ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने निराकार चेहरों को सिर्फ मुख्यमंत्री या केंद्र सरकार के मंत्री बनाया है, संगठन की कमान भी ऐसे ही निराकार नेताओं के हाथ में सौंपी है, जिनका न तो जमीनी आधार है और न कोई राजनीतिक, सामाजिक पकड़ है। चाहे अमित शाह की केंद्रीय टीम के पदाधिकारी हों या राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष और उनके बनाए पदाधिकारी हों। सब बिना चेहरे और आधार के हैं। राज्यों के प्रभारियों की भी यहीं स्थिति है और टेलीविजन चैनलों पर बैठ कर पार्टी व सरकार का बचाव करने वाले चेहरे भी ऐसे ही हैं।

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना कर पांच साल पहले भाजपा जब चुनाव मैदान में उतरी थी तब राजनाथ सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। इसमें संदेह नहीं है कि मोदी के नाम से एक लहर पैदा हुई थी पर उस लहर को आम लोगों तक ले जाने और उसे वोट में बदलने का भाजपा का एक सिस्टम था। राजनाथ सिंह से और उनसे पहले नितिन गडकरी ने इस सिस्टम को तैयार किया था। पार्टी के सारे बड़े नेता या तो राज्यों की कमान संभाल रहे थे या केंद्रीय संगठन में थे। 

राजनाथ सिंह की टीम में अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव थे। खुद यूपी के होने के बावजूद राजनाथसिंह ने अमित शाह को यूपी का प्रभारी बनाया। उन्होंने देश के सबसे बड़े राज्य में लोकसभा की 80 में से 73 सीटें भाजपा को दिलाईं। आज अमित शाह की कमान में उत्तर प्रदेश बिना प्रभारी के है। राज्य के प्रभारी ओम माथुर अब वहां नहीं जाते हैं। उनकी जगह अमित शाह के पार्टी के एक दूसरे महासचिव भूपेंद्र यादव घूमते हैं। कहा जा रहा है कि वे कामकाज देख रहे हैं। पर हकीकत यह है कि भाजपा बिना संगठन और बिना संगठन प्रभारी के है। ऐसा लग रहा है कि बिना फुल टाइम प्रभारी के भाजपा इस बार चुनाव में उतरेगी। मोदी और शाह को अपने चेहरे पर सब कुछ संभाल लेने का भरोसा है। पर लोकसभा की तीन सीटों और एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा को मिली हार से संगठन की कमजोरी जाहिर हो गई है। राज्य में पार्टी के किसी नेता का कोई मतलब नहीं रह गया है। 

बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा का जो प्रयोग बुरी तरह पिटा अभी तक वह उसी पर कायम है। यह जानते हुए कि राज्य में यादव मतदाता लालू प्रसाद के साथ हैं, भाजपा ने भूपेंद्र यादव को प्रभारी बनाया हुआ है और उनके चहेते नित्यानंद राय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। भाजपा ने पिछड़ा अध्यक्ष, पिछड़ा उप मुख्यमंत्री और अति पिछड़ा विधायक दल का नेता कर राजनीति साधने का प्रयास किया है। इसी राजनीति में भाजपा विधानसभा चुनाव में औंधे मुंह गिरी थी। हकीकत यह है कि नित्यानंद राय का उनके चुनाव क्षेत्र से बाहर कोई आधार नहीं है और न एक दर्जन संसदीय समितियों में शामिल और अमित शाह के सबसे करीबी बताए जा रहे भूपेंद्र यादव के पास इतना समय है कि वे बिहार की राजनीति संभाल सकें। 

पड़ोसी राज्य झारखंड में तो संगठन की स्थिति और भगवान भरोसे है। पिछले चुनाव से पहले उत्तराखंड के त्रिवेंद्र सिंह रावत वहां के प्रभारी थे। हालांकि तब भी चुनाव धर्मेंद्र प्रधान और भूपेंद्र यादव की टीम लड़ा रही थी। रावत नाम के लिए प्रभारी थे। पिछले साल मार्च में रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। उसके बाद से झारखंड में भाजपा ने कोई प्रभारी ही नहीं बनाया। सरकार और संगठन दोनों मुख्यमंत्री के हवाले छोड़ दिया गया है। 

प्रवासी वोटों के लिए दिल्ली में मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। सांसद और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके कामकाज का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वे खुद ही अपने गृह राज्य बिहार जाकर लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं। यहीं स्थिति गुजरात में जीतू वघानी की है तो ऐसा ही हाल मध्य प्रदेश में राकेश सिंह और हरियाणा में सुभाष बराला का है। राजस्थान में कई महीनों की खींचतान के बाद महेंद्र सैनी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, जिनका कोई मतलब नहीं दिख रहा है। एक कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा को छोड़ कर देश के 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में एक प्रदेश अध्यक्ष ऐसा नहीं है, जिसके राजनीतिक सफर के बारे में लोग जानते हों और जो अपने चेहरे के दम पर प्रदेश संगठन को मजबूत करने में सक्षम हो। झारखंड में लक्ष्मण गिलुआ से लेकर पश्चिम बंगाल में दिलीप घोष, उत्तर प्रदेश में महेंद्र नाथ पांडेय से लेकर उत्तराखंड के अजय भट्ट हों या पंजाब के श्वेत मलिक, सब ऐसे प्रदेश अध्यक्ष हैं, जिनकी असली ताकत पार्टी आलाकमान है। 

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