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बिहार की तस्वीर सर्वाधिक धुंधली

इस साल के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने सबसे पहले बिहार में काम शुरू किया था। जुलाई 2017 में ही भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर ली थी। तभी नीतीश कुमार को राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के गठबंधन से निकाला गया और भाजपा के समर्थन से एक बार फिर उनको मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा ने 2015 के विधानसभा चुनाव से सबक लिया था, जिसमें रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के साथ होने के बावजूद भाजपा बुरी तरह हारी थी। इस बार भाजपा के साथ उपेंद्र कुशवाहा और मांझी नहीं हैं पर नीतीश लौट आए हैं। इसके लिए भाजपा ने बड़ी कुर्बानी दी। पिछली बार लड़ी 30 में से 13 सीटें छोड़ दीं। उसने अपनी जीती हुई पांच सीटें छोड़ कर सिर्फ 17 सीट पर लड़ने का फैसला किया ताकि नीतीश के साथ बराबरी पर तालमेल हो। 

इसके जवाब में दो पुराने सहयोगियों राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने महागठबंधन बनाना शुरू किया है। इसमें उपेंद्र कुशवाहा आ गए हैं और जीतन राम मांझी भी आ गए हैं। शरद यादव भी इसमें हैं तो पप्पू यादव और लेफ्ट पार्टियों से भी बात हो रही है। महागठबंधन की पार्टियों और नेताओं को देख कर ऐसा लग रहा है कि उसकी ताकत ज्यादा बड़ी है। तभी भाजपा के नेता भी बराबर की लड़ाई मान रहे थे। पर बारीकी से राज्य के सामाजिक समीकरण पर नजर डालने के बाद मामला इतना आसान नहीं दिखता है। नीतीश कुमार और उनके चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर सामाजिक समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए काम कर रहे हैं। वे हवा का रुख मोड़ रहे हैं। कई कारण हैं, जिनकी वजह से वे यह काम प्रभावी तरीके से कर पा रहे हैं। 

एक तो राजद सुप्रीम लालू प्रसाद जेल में हैं। दूसरे, उनके पुराने तमाम सिपहसालार राजद के सिस्टम से बाहर हो गए हैं। तेजस्वी यादव नए सलाहकारों की राय से काम कर रहे हैं। तीसरे, सामान्य वर्ग के आरक्षण को लेकर तेजस्वी ने जो स्टैंड लिया है वह भी उनकी पार्टी को अलग थलग करने वाला है। वे समझ रहे हैं कि 2015 की तरह वे आरक्षण के मसले पर अगड़ा-पिछड़ा की लड़ाई बना देंगे और भाजपा को हरा देंगे। पर वे भूल रहे हैं कि उस समय मंडल की राजनीति के तीन मसीहा एक साथ प्रचार कर रहे थे। लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और शरद यादव के साझा प्रयास का असर था कि अगड़ा-पिछड़ा की लड़ाई बन पाई थी। इस बार लालू प्रसाद का चेहरा प्रचार में नहीं होगा और नीतीश कुमार दूसरे पाले में हैं। शरद यादव की राजनीति भी एक या दो सीट की हो गई है। 

लालू प्रसाद का जेल में होना नीतीश के लिए बड़ा एडवांटेज है। वे और प्रशांत किशोर सामाजिक समीकरण को अपने हिसाब से ढाल रहे हैं। भाजपा ने लगभग पूरी तरह से बिहार के चुनाव की कमान नीतीश के हाथ में छोड़ी है। प्रदेश भाजपा के नेता थोड़ी बहुत सक्रियता दिखा भी रहे थे तो नीतीश ने उनको बता दिया कि प्रशांत किशोर को उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कहने पर पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया है। सो, प्रदेश भाजपा शांत पड़ी है और नीतीश व प्रशांत किशोर सामाजिक समीकरण और राजनीतिक प्रबंधन संभाल रहे हैं। 

बिहार में राजद का वोट आधार माई समीकरण का है यानी मुस्लिम और यादव के सहारे अब तक राजद की राजनीति चलती रही है। नब्बे के दशक के शुरुआती समय को छोड़ दें, जब लालू प्रसाद पिछड़ों के मसीहा होते थे तो बाद के समय में वे मोटे तौर पर माई समीकरण के ही नेता रहे। समय समय पर इसमें कुछ दूसरे वोट जुड़ते रहे। यह वोट करीब 30 फीसदी होता है। जब कांग्रेस राजद के साथ होती है तो उसका कुछ वोट जुड़ जाता है। इसमें मुख्य रूप से दलित और थोड़ा ब्राह्मण वोट होता है। 2015 में नीतीश कुमार के उनके साथ लौटने के अतिपिछड़ा और कुछ सवर्ण वोट जुड़ा था, जिससे राजद, जदयू और कांग्रेस का गठबंधन भाजपा गठबंधन को हटाने में कामयाब हो गया था। 

लालू से उलट नीतीश कुमार ने किसी जाति की राजनीति नहीं की। वे खुद कुर्मी जाति से आते हैं, जिसका तीन फीसदी के करीब वोट है। पर इससे मिलती जुलती जातियों खास कर कोईरी और धानुक को अपने साथ जोड़ कर वे आठ से दस फीसदी वोट के नेता बने। इनके अलावा कर्पूरी ठाकुर फार्मूले को अपना कर नीतीश ने अतिपिछड़ा समूह को यादव से अलग किया। उनके लिए योजनाएं शुरू कीं और आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान किया। इसका नतीजा यह हुआ कि नीतीश गैर यादव पिछड़ों के और गैर पासवान दलितों के नेता बन गए। उनका अतिपिछड़ा और महादलित का कार्ड पिछले 15 साल से चल रहा है। 

नीतीश कुमार अगले चुनाव के लिए जो सामाजिक समीकरण बना रहे हैं वह इसी फार्मूले पर है। उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि को तोड़ लिया है। नागमणि कुशवाहा समाज से आते हैं और उस समाज के सबसे बड़े नेता जगदेव प्रसाद के बेटे हैं। जीतन राम मांझी की पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष वृषेण पटेल ने भी मांझी की पार्टी छोड़ दी है। यह नीतीश के कुर्मी-कोईरी यानी लव-कुश समीकरण को साधने के प्रयास का हिस्सा है। वे गैर यादव पिछड़ी जातियों को एकजुट कर रहे हैं। रामविलास पासवान के साथ होने की वजह से दलितों का बड़ा हिस्सा एनडीए के साथ है और भाजपा की वजह से वैश्य और सामान्य वर्ग के आरक्षण के सहारे सवर्ण साथ में होने का भरोसा है। 

कुल मिला कर बिहार में अभी हालात बहुत ढुलमुल हैं। नेता पाला बदल कर इधर से उधऱ जा रहे हैं। एक दर्जन पार्टियों के दर्जनों नेता लोकसभा सीट के दावेदार हैं और टिकट नहीं मिलने की आशंका में इधर उधर भागदौड़ कर रहे हैं। एक तरफ तमाम सवर्ण नेता कांग्रेस की ओर जा रहे हैं तो यादव नेताओं का रूझान राजद की ओर बना है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी भले टूट रही है पर कोईरी वोट का एक हिस्सा अब भी उनके साथ है। इसी तरह मांझी की वजह से दलित समुदाय का एक हिस्सा राजद के साथ रहेगा। गैर यादव पिछड़ी जातियों में से एक मजबूत समूह मल्लाह का है, जिसमें सहनी, निषाद, बिंद आदि जातियां आती हैं। इसके नेता के तौर पर उभरे मुकेश साहनी भी राजद गठबंधन से जुड़े हैं। सो, दोनों तरफ सामाजिक समीकरण मजबूत करने का प्रयास चल रहा है और उसी प्रयास में तोड़फोड़ हो रही है। इसी वजह से बिहार की तस्वीर साफ नहीं हो पा रही है और रोज हो रहे बदलाव से पलड़ा भी इधर या उधर झुक रहा है। 

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