उफ! सेना की साख का भी भट्ठा, अन्य संस्थाओं जैसा!

किसी भी पहलू से सोचें, देखें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की सेना का पिछले 55 महीने में जैसा-जो उपयोग किया है उससे न केवल रक्षा मंत्रालय, सुरक्षा-सामरिक सेटअप का भट्ठा बैठा है, बल्कि, सेनाओं के पराक्रम, हथियारों की खरीद, सुरक्षा-सामरिक चुस्ती सबको देश-दुनिया में मजाक, अविश्वसनीयता, फर्जीकल स्ट्राइक, झूठ की शर्म में फंसवा दिया है। आज की सुर्खी पर गौर करें। खबर पढ़ने को मिली कि 1971 में बांग्लादेश मुक्ति के वीरचक्र प्राप्त पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल रामदास ने चुनाव आयोग को लिखा है कि वे वायु सेना के पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक ऑपरेशन के चुनावव में दुरूपयोग की चिंता में हैं। मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है। पुलवामा और बालाकोट की घटना के बाद सशस्त्र सेनाओं के राजनीतिक फायदे के हालिया जो उदाहरण हैं वे सशस्त्र सेनाओं के आदर्शों, ईथॉस के विपरीत हैं। कुछ सप्ताह बाद चुनाव है। इसलिए चुनाव आयोग सुरक्षित करे कि इन घटनाओं का राजनीतिक मकसद, जयकारे, अंधदेशभक्ति-राष्ट्रवादी प्रोपेगेंडा के लिए (misuse of these recent events by any political party to send triumphalist or jingoistic messages.) उपयोग न हो।

सोचें पूर्व नौ सेना प्रमुख की इस चिंता पर। क्या नहीं लगता कि जैसे सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी संस्था की चिंता की वैसी चिंता आज सेना में भी होगी। बतौर नागरिक हमें भी भारत राष्ट्र-राज्य, उसके लोकतंत्र में संस्थाओं की पवित्रता, तटस्थता, गरिमा की खातिर सेना की साख को ले कर चिंता में होना चाहिए। पूरी दुनिया में, उनके मीडिया के संपादकीय में यह चर्चा है, धारणा है कि नरेंद्र मोदी सेना के पराक्रम से, जवानों के खून पर जनता की भावनाओं को बहका कर वोट पका रहे हैं। विपक्ष को देशद्रोही करार दे रहे हैं। जैसे सुप्रीम कोर्ट, संसद, सीबीआई, ईडी, सीवीसी, सीएजी, मीडिया आदि तमाम संस्थाओं को 55 महीने में मोदी राज ने गुलाम बना उनका मनमाना उपयोग किया, संस्थाओं की साख-धाक-गरिमा को राजनीतिक एजेंडे में मोहरा बनाया वैसा ही उन्होंने सेना के साथ कर डाला है।  

तभी विकट मसला है कि पूर्व नौ सेना प्रमुख के जरिए सेना के भीतर की चिंता, उसे अराजनीतिक बने रहने देने के लिए चुनाव आयोग आगे चुनाव में मोदी-शाह-भाजपा को कैसे रोकेगा? सेना के नाम, उसके पराक्रम का जो उपयोग हो रहा है क्या वह चुनाव में भी होगा?  रिटायर नौसेना प्रमुख की चिंता, उनकी मांग में चुनाव आयोग ऐसा क्या करें, जिससे मोदी-शाह द्वारा चुनाव को पानीपत की तीसरी लड़ाई बना देने में न दिखे कि सेना ने मोदी का झंडा उठा रखा है और सेना के झंडे से नरेंद्र मोदी उसकी बात कर विपक्ष को, विरोधी नेताओं को देशद्रोही, पाकिस्तानी एजेंट न कहें!  

पता नहीं रियाटर सेना प्रमुख की बात से मौजूदा थल सेना प्रमुख बिपिन रावत और वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ सहमति रखते है या नहीं? अपना मानना है कि हालिया घटनाक्रम ने सभी सेनाधिकारियों को मन ही मन अहसास करा रखा होगा कि सेना की साख, धाक, गरिमा का सरकार और उसके मंत्रियों ने दुनिया में भट्ठा बैठा दिया है? पूरा रक्षा मंत्रालय मजाक, अविश्वसनीयता का पात्र है। कैसी तो खबरें और उनसे वैश्विक तौर पर कैसा मजाक व झूठ बना है। जैसे

1-सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के नंबर एक विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल ने कहा कि रक्षा मंत्रालय से राफेल की फाइल, दस्तावेज चोरी हुए हैं लेकिन एक दिन बाद पूरी दुनिया में मजाक होने से पलटते हुए सफाई दी की मैंने तो ऐसा नहीं कहा था। चोरी की बात नहीं कहीं थी।

2-पाकिस्तान में बालाकोट पर वायु सेना के हमले के बाद सरकार का सूत्रों के हवाले सेना की काबिलियत पर सवाल उठवाने वाला झूठा हल्ला करवाना कि 300-250-350 आंतकी मारे। मगर फिर कभी सेना प्रमुख रहे जैसे मंत्री का यह कहना कि मैंने मच्छर मारने की दवा छिड़की तो उसके बाद क्या मैं मरे मच्छरों को गिनने बैठूंगा। 

3-संदेह नहीं कि भारत की सेना की साख का भट्ठा बैठाने वाला नंबर एक हल्ला खुद मोदी सरकार का बनवाया हुआ था। कई दिन टीवी चैनलों पर चलवाया कि इतने मार डाले। जबकि वैश्विक मीडिया, बीबीसी, रायटर, न्यूयार्क टाइम्स आदि किसी ने आंतकियों के कैंप के भारी नुकसान, भारी तादाद में आंतकियों के मारे जाने की खबरें और तथ्य नहीं दिए। न ही बाद में खुद अपने वायु सेना अध्यक्ष आदि किसी ने भी अमित शाह के 250 मरने के दावे या मीडिया के 350 के आंकड़े को सही बताने वाला प्रमाण पेश किया। 

4-क्या यह सेना के पराक्रम से मोदी सरकार का खेलना नहीं था? इस बात पर कल ही आंतकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई के एक पुलिस महानायक रिबेलो की कही बात पर गौर करें। उन्होंने कहा कि भाजपा ने अनावश्यक बढ़ चढ (unnecessary exaggerations) आंतकियों को बड़ी संख्या में मारने, एफ-16 विमान को मार गिराने जैसा हल्ला बिना प्रमाणित कराए कराया। यह भारतीय वायु सेना के अच्छे पेशेवर काम से ध्यान बंटवाने वाली, दुष्परिणाम वाली बात बनी। 

5-सेना की साख के भट्ठे का सर्वाधिक गंभीर मामला बालाकोट के टारगेट को ले कर भारत के टीवी चैनलों में सरकारी सूत्रों के हवाले दिखाया वह झूठ है, जिसमें हथियार बेचने वाले या डेमो वीडियो से जनता को टीवी चैनलों पर मूर्ख बनाने का काम हुआ। दिखाया गया कि कैसे एक मकान में रॉकेट मकान की छत को फाड़ घुसता है लेकिन उससे पूरा मकान ध्वस्त नहीं होता है। सो, विदेशी विशेषज्ञ सेटेलाइट इमेज दिखलाते हुए बालाकोट से नुकसान न होने की जो बाते कर रहे है वे गलत हैं। हमारा टीवी चैनल पहला जो बालाकोट के विनाश का सच दिखा रहा है। सोचें, अरनब गोस्वामी एंड पार्टी के चैनलों की देश में दो कौड़ी की इज्जत नहीं है। तब अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट, मीडिया में क्या यह राय नहीं बनेगी कि भारत की सेना अपने ऑपरेशन को सच्चा बताने के लिए जब झूठे लोगों का सहारा ले रही है तो दाल में काला है। 

6-तभी मंत्री गिरिराज सिंह ने सेटेलाइट इमेज के दो प्रमाण दे कर ट्विटर पर जब लिखा कि तस्वीरें साफ-साफ बता रही हैं कि भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तानी आंतकी कैंप के परखच्चे उड़ा दिए तो बीबीसी की सामान्य फैक्ट चेक टीम ने भी झूठ को पकड़ा। बताया कि पहली तस्वीर गूगल मैप्स से ली गई एक सेटेलाइट तस्वीर है तो दूसरी तस्वीर 'जूम अर्थ' वेबसाइट से है और उसके संस्थापक का कहना है कि यह वर्षों पुरानी तस्वीर होगी। इस सेटेलाइट तस्वीर में दिख रही इमारत निर्माणाधीन है। एयरस्ट्राइक से कोई लेना-देना नहीं है।

7-पिछले 55 महीने के ऐसे कई विवाद, कई घटनाएं हैं, जिनसे सेना की साख-धाक का भट्ठा बैठा। राफेल विमान सौदे में अंबानी की कंपनी को ठेका, सरकार की स्थापित-पुरानी एचएएल कंपनी की क्षमता पर सवाल लगना भट्ठा बैठाने वाली हकीकत है तो डोकलाम क्षेत्र में चीन की दादागिरी और फिर उसके आगे झुकने को दुनिया में कैसे लिया गया, इसकी भी असंख्य रपटें हैं। ऐसे ही सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त का दावा, आंतकियों की कमर तोड़ने, उनको भारी नुकसान की बड़ी-बड़ी बातों के बीच सेना के ठिकानों, छावनी, सैनिकों-जवानों पर ही लगातार आतंकी हमले की अलग ऐसी वास्तविकता है, जिसका अर्थ है कि मोदी राज में आंतकियों की हिम्मत इतनी बढ़ी जो सीधे पठानकोट, उरी छावनी से लेकर जवानों के मूवमेंट पर हमले होने लगे।  

8-एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी, थल सेना प्रमुख बिपिन रावत का चीन और पाकिस्तान दोनों से एक साथ लड़ लेने की तैयारी के जुबानी पराक्रम वाले हुंकारे तो दूसरी और दो सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद आंतकियों की संख्या बढ़ने, कश्मीर घाटी में आंतकियों की नई भर्ती की हकीकत ने भी चिंताएं बनाई हैं। सैनिक स्ट्राइक पर वैश्विक संदेह का सीधा अर्थ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 55 महीने में सेना का ऐसे उपयोग किया है, जैसे बाकि संस्थाओं का उपयोग किया है। इतना भी ध्यान नहीं रखा कि यदि सेना की धमक, गरिमा और साख को पानीपत की तीसरी लड़ाई में वोटों के लिए अपने झंडे में तब्दील कर दिया, एक बार सेना का चरित्र ऐसे बिगाड़ा तो राष्ट्र-राज्य का भविष्य, आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा? 

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