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क्या ‘कानून के राज’ की समाप्ति?

सत्येन्द्र रंजन
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(image) ‘कानून के राज’ का सीधा अर्थ यह है कि सबके लिए समान कानून हो और कानून के आगे सभी लोग बराबर हों। जिस समाज में इस सिद्धांत को अपनाया जाता है, वहां इसे सुनिश्चित करने के लिए उचित तंत्र, प्रक्रियाएं, संस्थाएं, व्यवहार और कायदे स्थापित किए जाते हैं। मकसद सरकार या ताकतवर समूहों के मनमाने व्यवहार पर रोक लगाना होता है। राजतंत्र, तानाशाही, अधिनायकवादी शासन या सर्वसत्तावादी शासन-तंत्रों में सत्ताधारी या शक्तिशाली समूह मनमाना व्यवहार करते हैं। उन पर रोक की कोई व्यवस्था वहां नहीं होती। इसीलिए ‘कानून का राज’ और लोकतंत्र के बीच अभिन्न संबंध माना जाता है। कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था कानून की सर्वोच्चता सुनिश्चित किए बिना नहीं चल सकती। हालांकि ग्रीस में चौथी सदी ईस्वी पूर्व में अरस्तू ने ‘कानून के राज’ और ‘व्यक्ति के राज’ में फर्क किया था, लेकिन यह सिद्धांत वहां व्यवहार में उतरा, इस बारे में ऐतिहासिक तौर पर कहना कठिन है। इसीलिए इस सिद्धांत का प्रमुख व्याख्याता 18वीं सदी के फ्रेंच दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू को माना जाता है। अपनी किताब ‘द स्पीरिट ऑफ लॉ’ज’ में उन्होंने ‘कानून के राज’ के सिद्धांत की व्याख्या की। इस सिद्धांत का आरंभिक उद्देश्य राजा, निरंकुश शासकों या तानाशाहों की असीमित सत्ता को नियंत्रित करना था। निरंकुश या असीमित सत्ता का आधार शक्तिशाली सामाजिक वर्ग थे, जो समाज में बिना किसी अंकुश के व्यवहार करते थे। दरअसल, आज भी जिन समाजों में लोकतंत्र और कानून के शासन को सुनिश्चित करने वाला संविधान लागू नहीं है, वहां सत्ताधारी और शक्तिशाली वर्ग मनमाना व्यवहार करते हैं। विभिन्न समाजों में जनता के लिए लंबे संघर्षों के परिमाणस्वरूप ऐसे निरंकुश व्यवहार या सत्ता ढांचे पर नियंत्रण लगा। यह प्रक्रिया सदियों तक चली। कई चरणों से होकर गुजरी। मैग्नाकार्टा, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम और फ्रांस की क्रांति इसके कुछ प्रमुख चरण हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर इन घटनाओं, उनसे उत्पन्न मूल्यों एवं राजनीतिक सिद्धांतों तथा उनकी वजह से वजूद में सामने आए राजनीतिक ढांचे का गहरा प्रभाव स्वयंसिद्ध है। भारत में 19-20वीं सदी में चले समाज सुधार आंदोलनों और उसके बाद की राजनीतिक प्रक्रियाओं से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक खास विचारधारा बनी। उसका मूर्त रूप भारत का संविधान है। इसमें ‘कानून के राज’ के सिद्धांत को अपनाया गया। जिस ‘संप्रभु, समाजवादी, पंथ-निरपेक्षक, लोकतांत्रिक गणराज्य’ बनाने का उद्देश्य इसमें जताया गया, उसकी बुनियाद ‘कानून का राज’ है। संवैधानिक रूप से भारत में शासन राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अथवा किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि कानून का है। कानून के आगे सभी लोग बराबर हैं। कानून की व्यवस्था ठीक से चले, इसलिए राज्य-व्यवस्था को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभक्त किया गया है। प्रशासन (नौकरशाही) को अ-राजनीतिक रखने की व्यवस्था की गई, ताकि वह निष्पक्ष होकर कानून पर अमल करवा सके। दरअसल, संविधान के तहत शासन भी एक आधुनिक धारणा है। संविधान में राज्य व्यवस्था के हर अंग और पदाधिकारियों के अधिकार एवं कर्त्तव्य निर्धारित होते हैं। सिद्धांततः कोई भी तय दायरे से बाहर जाकर काम नहीं कर सकता। जो ऐसा करने की कोशिश करेगा, उसके लिए दंड तय है। संवैधानिक व्यवस्था स्वेच्छाचार या मनमानेपन पर रोक लगाती है। असल में संविधान को अपनाने का अर्थ ही ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ की चलन को रोकना होता है। संविधान-सम्मत व्यवस्था के तहत बनाए गए कानून समाज की चेतना का मूर्त रूप माने जाते हैं। विचार-विमर्श, वाद-विवाद और बहस-मुबाहिशे कानून बनने की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग हैं। समाज के संचालन के लिए तर्क और विवेक से समाज जिस यथासंभव आम-सहमति पर पहुंचता है, उसे कानून का रूप दे दिया जाता है। हालांकि लोकतंत्र में यह काम विधायिका का है, लेकिन अपेक्षित यह होता है कि इस प्रक्रिया में व्यापक जन-भागीदारी हो। विधायिका वहां से उभरी सहमति के अनुरूप- लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए- कानून का निर्माण करे। न्यायपालिका इस प्रक्रिया को दोषमुक्त रखने तथा कानून पर अमल सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी निभाती है। सत्तर साल पहले भारत ने इसी प्रकार की संवैधानिक व्यवस्था अपनाई थी। भारत के लंबे इतिहास में यह पहला मौका था, जब ‘कानून के राज’ का सिद्धांत यहां अमल में लाया गया। इसके परिणामस्वरूप बीते दशकों में मनमाने व्यवहार का परंपरागत विशेषाधिकार रखने वाले समूहों पर एक हद तक लगाम लगी। दूसरी तरफ सदियों से दबा कर रखे गए समूहों के आगे बढ़ने का रास्ता खुला। स्वाभाविक था कि इससे सामाजिक-सांस्कृतिक तनाव पैदा हुए। जिन तबकों पर नियंत्रण लगा, उन्होंने इसे सहज स्वीकार नहीं किया। नई व्यवस्था को पलटने के लिए वे प्रयासरत रहे। आखिरकार नई परिस्थितियों में वे सफल होते दिख रहे हैं। ‘कानून के राज’ की आज दिन-दहाड़े धज्जियां उड़ रही हैं। वैसे तो देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी मिसाल अक्सर देखने को मिलती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में जिस नंगेपन के साथ ये हो रहा है, वह भयभीत करने वाला है। जब स्वयंभू समूह बिना की किसी वैधानिक अधिकार के समाज में मनमाने नियम-कायदे लागू करने लगें, तो बेशक ऐसा ‘कानून के राज’ को धता बताने की कीमत पर ही होता है। गौ-रक्षा दल, हिंदू वाहिनी, एंटी रोमियो दस्ता आदि जैसे संगठन आज ठीक यही कर रहे हैं। पुलिस या तो उनके आगे लाचार होती है, या फिर वह उनके सहायक की भूमिका में सामने आती है। ऐसी अनगिनत घटनाएं हुई हैं, जब ऐसे संगठनों से जुड़े लोगों ने लोगों पर हमले किए, उनकी निजता तोड़ी- मगर पुलिस ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। कुछ मामलों में तो उलटे पीड़ित को पर ही मुकदमे ठोक दिए गए। ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि इन संगठनों के राजनीतिक आका आज दिल्ली और प्रदेश राजधानियों में सत्तासीन हैं। बल्कि कुछ मामलों में तो भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकारों ने- खास कर गौ रक्षा के मामलों में- ऐसे संगठनों के पदाधिकारियों को औपचारिक पद प्रदान किया है। मसलन, महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने गोमांस पर प्रतिबंध को लागू करने के लिए हर जिले में ‘मानद पशु कल्याण अधिकारी’ की नियुक्ति की है। इन पदों पर पहले “अवैध ढंग से गौ तस्करी” रोकने में शामिल रहे लोगों को बैठाया गया है। इस परिघटना की व्याख्या करते हुए जाने-माने विद्वान क्रिस्टोफ जेफरलॉट ने लिखा है- “हिंदू राष्ट्रवादी पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं और वे नहीं चाहते कि समाज पर राज्य की सत्ता चले। उनकी राय में समाज को खुद को विनियमित करना होगा, जिसमें जोर हिंदू मान्यता के अनुरूप सामाजिक व्यवस्था या सद्भाव अथवा अनुक्रम (hierarchy) पर होगा। अंततः जन-इच्छा कानून के ऊपर है- दरअसल यही कानून है।” इस समझ का भारतीय संविधान की भावना से विरोध पर गौर करना यहां उचित होगा। भारतीय संविधान ने ऐसे लोकतंत्र की कल्पना की, जिसमें शासन बहुमत से चलेगा, लेकिन बहुमत मूलभूत मानवाधिकारों, मानव विवेक और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन नहीं कर सकता। इसीलिए भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए। न्याय की आधुनिक व्यवस्था की गई- जिसमें फैसला अकाट्य साक्ष्य और विवेक-सम्मत दलीलों से तय होता है। इसके विपरीत अभी जो हो रहा है, उसमें बहुसंख्यक समुदाय की कथित धार्मिक भावना को ताकत के जोर से दूसरों पर थोपा जा रहा है। उसे कानून से ऊपर माना जा रहा है। जाहिरा तौर पर कोशिश ताकत के सिद्धांत को फिर से स्वीकृत कराने की है। मकसद यथास्थिति को बरकरार रखना- और संभव हो तो पुरानी परंपराओं या रीति-रिवाजों को वापस लाना है। यथास्थिति की रक्षा का मतलब आज जो लोग सुख-सुविधा और पुराने विशेषाधिकारों का भोग कर रहे हैं, उनकी ये हैसियत कायम रखना है। इसी का दूसरा मतलब जो लोग वंचित, शोषित और दमन का शिकार रहे हैं, उन्हें उन्हीं परिस्थितियों में बनाए रखना है। पुराने रीति-रिवाजों को वापस लाकर स्त्री स्वतंत्रता या समलैंगिक-ट्रांसजेंडर समुदाय अथवा दलित-पिछड़े समुदायों के लिए बनी नई अनुकूल स्थितियों को समाप्त करना है। ऐसा हो जाए, तो जातीय-वर्गीय और लैंगिक आधार पर जो लोग अतीत में लाभ की स्थिति में थे, उनकी वही सुविधाएं या हैसियत वैधानिक (हिंदू विधान) रूप से बहाल हो जाएंगी। स्पष्टतः ऐतिहासिक रूप से कमजोर अवस्था में रहे तमाम जन-समूहों का हित वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा करने में है। संविधान से तय कायदों ने उन्हें वो अवसर दिए, जो उनके पूर्वजों को कभी नहीं मिले। लेकिन आज उनका एक बड़ा हिस्सा हिंदुत्व के प्रचार का शिकार होकर उन शक्तियों का सहयात्री बना हुआ है, जिनका मकसद संवैधानिक व्यवस्था और ‘कानून के राज’ को खत्म करना है। लगभग सारी दुनिया में इस समय आमदनी और धन की विषमता संभवतः सबसे प्रमुख मुद्दा बनी हुई हैं। इस सिलसिले में हुए अध्ययनों से जाहिर हुआ है कि ये खाई 1980 के दशक में अपनाई गई नव-उदारवादी नीतियों के बाद तेजी से बढ़ी है। ये वो दौर है, जिसमें गरीब और मध्य वर्गों की वास्तविक आमदनी या तो स्थिर रही या घटी। जबकि मुट्ठी भर तबकों की आमदनी और उनके धन में असीमित इजाफा हुआ। इस परिघटना से निर्मित नए समाजों में कई खास प्रवृत्तियां देखने को मिली हैं। निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती में भारी बढ़ोतरी उनमें एक है। ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ में छपी एक अध्ययन रिपोर्ट से सामने आया कि कैसे विभिन्न देशों में राज्य (state) कमजोर हुए हैं और लगातार शक्तिशाली होते गए धनी तबकों ने अपनी सुरक्षा का खुद इंतजाम कर लिया। तात्पर्य यह कि जो सक्षम तबके हैं, उन्हें राज्य की जरूरत नहीं है। या उन्हें बस ऐसे राज्य की आवश्यकता है, जो सीमाओं की सुरक्षा करे, एक हद तक आंतरिक सुरक्षा का बोझ उठाए और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था से संचालन का मार्ग सुगम बनाए। राज्य की बाकी भूमिकाओं की आवश्यकता वंचित और कमजोर तबकों को होती है। इन भूमिकाओं में आधुनिक संविधानों में वर्णित सबके मूलभूत अधिकारों की रक्षा, उन अधिकारों के अनुरूप जीवन सुनिश्चित करने की स्थितियां तैयार करना, और सबको विकास एवं बेहतरी के समान धरातल उपलब्ध कराना शामिल है। इस रूप में राज्य की भूमिका की धर्म आधारित राष्ट्र-राज्य में संभव नहीं है। दरअसल, कल्याणकारी राज्य एक आधुनिक परिकल्पना है। आज अपने देश में यही परिकल्पना खतरे में पड़ गई है। बात सिर्फ अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन की नहीं है, हालांकि यह अपने आप में संविधान के उल्लंघन का गंभीर मामला है। लेकिन असल मकसद उससे कहीं आगे का है। मुसलमानों को लेकर बहुसंख्यक समुदाय में मौजूद पूर्वाग्रहों को हवा देते हुए फिलहाल ‘हिंदू एकता’ की बात जरूर की जा रही है, लेकिन इस घटनाक्रम का नुकसान सिर्फ मजहबी अल्पसंख्यकों को नहीं होगा। संविधान और कानून के राज की व्यवस्था ढही, तो समतामूलक और प्रगतिशील समाज बनाने की दिशा में अब तक हासिल हुई तमाम उपलब्धियां ध्वस्त हो जाएंगी। हर नागरिक की आजादी तय करने की दिशा में उठे कदम वापस धकेल दिए जाएंगे। पुराने पूर्वाग्रह, दबंगई और निरंकुशताएं भारतीय समाज में पुनर्स्थापित कर दी जाएंगी। दुर्भाग्यपूर्ण है कि उस दिशा में देश तेजी से जा रहा है। न्यायपालिका, संसदीय विपक्ष और सिविल सोसायटी इस परिघटना पर लगाम लगाने में फिलहाल विफल हैं। उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि मौजूदा स्थिति को इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश भी कम ही हुई है। वर्तमान सत्ताधारी दल को आम राजनीतिक पार्टी मानना, और उसके असली एजेंडे को पहचानने में अनिच्छा का परिणाम आज की स्थिति है। अब ‘कानून के राज’ की विरोधी ताकतें एक बड़ा खतरा बन चुकी हैं। क्या इस सिद्धांत की रक्षा के लिए ‘प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष’ ताकतें निर्णायक संकल्प दिखाने को तैयार हैं?
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