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कैसे होंगी सड़कें सुरक्षित!

सड़क हादसों में मौत के मामले में भारत हालांकि पहले स्थान पर है लेकिन यह वैश्विक समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि दुनिया भर में 15 से 29 साल के लोगों की असमय मौत की सबसे बड़ी वजह सड़क हादसे हैं। हर साल तीन लाख चालीस हजार युवा अपनी जान गंवाते हैं। यह एक गंभीर समस्या हो गई है और इसके समाधान के लिए प्रभावशाली कदम उठाने की वकालत की जा रही है। भारत में रोज औसतन चार सौ लोगों की मौत दहलाने वाली है। इसे एकदम से कम तो नहीं किया जा सकता लेकिन ठोस कदम उठाने की पहल तो की ही जा सकती है।

भारत में मैं पहली बार सड़क हादसों और उनमें मौत के कारणों को तेरह वर्गों में बांट कर शहर और राज्य के स्तर पर आंकड़े जुटाए गए हैं। इन आंकड़ों से कई तरह की वजह सामने आई है। 2014 में वाहनों की सीधी टक्कर में 27 हजार 740 लोगों की मौत हुई। खराब वाहनों ने सात हजार 179 लोगों की जान ली। टी जनक्शन पर 23 हजार 420, वाई जंक्शन पर तेरह हजार 897 और चौराहों पर 11 हजार 789 मौतें हुईं तो निश्चित रूप से इसकी वजह तेज रफ्तार या ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करना रहीं। विभिन्न एजंसियों से मिले आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 78.8 फीसद सड़क हादसे ड्राइवर की गलती से होते हैं और 56 फीसद से ज्यादा तेज रफ्तार की वजह से। दुनिया भर में सड़क हादसों और उनमें मरने वालों की संख्या इसीलिए बढ़ रही है क्योंकि वाहनों की रफ्तार बेलगाम हो रही है, शराब पीकर गाड़ी चलाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और हेलमेट व सीट बेल्ट का इस्तेमाल न करना फैशन में शुमार हो गया है। 

ये तमाम कारण वाहन चलाने वाले की मनःस्थिति से जुड़े हैं, लेकिन यह दूसरों के लिए ही नहीं उसके लिए भी जानलेवा साबित हो रहे हैं। 2014 में सड़क हादसों में जो एक लाख 41 हजार 526 लोग मरे उनमें से 75 फीसद दूसरे की गलती का शिकार हुए लेकिन 25 फीसद लोग ऐसे भी थे जिन्होंने ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करने का खामियाजा भुगता। लेकिन इसका दुखद पहलू यह भी है एक दोषी तीन निर्दोष लोगों की जान ले लेता है। बड़े वाहनों की चपेट में निर्दोष ही ज्यादा आते हैं। बस, ट्रक या लॉरी जैसे भारी वाहनों से हुए हादसों में करीब 41 हजार लोग मरे इनमें 83 फीसद से ज्यादा शिकार थे। हादसा करने वाले 17 फीसद ही चपेट में आए। लगभग यही अनुपात कार व अन्य वाहनों से हुए हादसों का भी रहा। बस कुछ फीसद का फर्क हो गया। 

मिसाल के तौर पर जीप व कार से हुए हादसे में 79 फीसद निर्दोष लोग मरे। 2014 में सड़क हादसों ने 7790 राहगीरों की जान ली। इस स्थिति को बदलने के लिए जरूरी है कि ट्रैफिक नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए, सभी मुख्य सड़कों पर डिवाइडर हो और रोशनी की समुचित व्यवस्था हो। वाहन चलाने वालों को अनुशासित करना सबसे ज्यादा जरूरी है। यह काम साल में एक बार ट्रैफिक जागरूकता सप्ताह या पखवाड़ा मना कर नहीं किया जा सकता। सभी स्तर की सरकारों को सड़क हादसों से होने वाली मौतों को कम करने का काम सर्वोच्च प्राथमिकता देकर करना होगा।

हादसे न हों इसके लिए जरूरी है कि सड़कों की दशा ठीक हो। सालों से विज्ञापनों के जरिए हर राज्य सरकार हजारों किलोमीटर नई सड़कें बनाने का दावा करती हैं लेकिन जमीनी हकीकत क्या है, इसके आंकड़े भी चौका देने वाले हैं। 2015 में ठाणे में पुलिस ने 26 साल की प्रीति प्रसाद के खिलाफ मामला दर्ज किया। वह स्कूटी पर अपनी मां को लेकर जा रही थी। सड़क के गड्ढ़े से बचने की कोशिश में उसका संतुलन गड़बड़ा गया। गिरने से मां की मौत हो गई। पुलिस ने आरोपी बना दिया प्रीति को। वह तो पुलिस आयुक्त ने दखल देकर प्रीति की गिरफ्तारी रुकवाई और पुलिस को खराब सड़क के लिए जिम्मेदार एजंसी का पता लगाने को कहा। यही नहीं कर्नाटक में भी खराब सड़कों की वजह से हुए हादसे में मौत पर पुलिस ने मरने वालों के परिजनों के खिलाफ ही भारतीय दंड विधान की धारा 304 ए (लापरवाही से हत्या करना) के तहत मामला दर्ज कर लिया। उत्तर प्रदेश में तो दो साल पहले नई पहल की योजना बनी थी जिसके तहत गड्ढ़े की वजह से होने वाले जानलेवा हादसों के लिए संबंधित क्षेत्र के सरकारी अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा कर उनके खिलाफ धारा 304 (ए) के तहत मामला दर्ज किया जाना था। आयुक्त के रवीद्रन नायक ने जिला मजिस्ट्रेट, स्थानीय निकाय और विकास एजंसियों को सड़कों पर गड्ढ़ों के लिए दोषी लोगों को सजा देने को कहा और निर्देश दिया कि दिन में सड़क की उतनी ही खुदाई की जाए जितनी शाम तक भरी जा सके। रात में गड्ढ़ों को कतई खुला न छोड़ा जाना चाहिए। लेकिन जल्दी ही यह कवायद कुंद पड़ गई।

निश्चित रूप से लोगों के जीवन के लिए खतरा बनती जा रही सड़कों की दशा सुधारना ज्यादा जरूरी है। टूटी-फूटी सड़कों और उन पर गड्ढ़ों की बहुतायत की वजह से ही खतरनाक सड़क हादसे नहीं होते। बिना किसी उपयोगिता के सड़कों पर लगाए गए स्पी़ड ब्रेकर और ऊंची नीची सड़कें भी इसकी बड़ी वजह हैं। 2014 में इन वजहों से 11 हजार चार सौ लोगों की जान गई। सड़क हादसों पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक सड़कों पर उतार-चढ़ाव होने की वजह से 13 हजार 449 हादसे हुए और इसमें 4726 लोगों की मौत हुई। स्पीड ब्रेकर करीब ग्यारह हजार हादसों की वजह बने और वे 3633 लोगों की जान ले गए। सड़कों पर गड्ढ़ों की वजह से 2014 में ग्यारह हजार 106 हादसे हुए और उनमें 3039 लोगों की जान गई। सड़कों की खराब स्थिति की वजह से अकेले उत्तर प्रदेश में 4453 लोग मरे। कर्नाटक में यह संख्या 970 और मध्य प्रदेश में 915 रही। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क बनाने में लापरवाही व धांधली और बन जाने के बाद उसकी सही रख-रखाव न होने से ही सड़कों की दशा बिगड़ रही है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सड़क निर्माण का ठेका दिए जाने में जम कर अनियमितता होती है। इस संजाल को तोड़े बिना और ठेकेदार, सरकारी अफसरों व राजनीतिज्ञों की जवाबदेही तय किए बिना सड़कों को सुरक्षित नहीं किया जा सकता। ज्यादातर सड़कों पर जो स्पीड ब्रेकर लगाए जाते हैं, उनमें एक सा मानक स्तर नहीं होता। विभिन्न एजंसियों में तालमेल न होना भी बड़ी समस्या है।

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