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सरकारें जो चाहती हैं

यह कहा जाएगा कि अपनी किताब के जरिए डी. सुब्बाराव ने एक बहुत जरूरी विषय पर चर्चा छेड़ी है। किताब के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने जो कहा, उस पर भी भारतवासियों को अवश्य ध्यान देना चाहिए।

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने अपनी ताजा किताब में यह राज़ खोला है कि उनके कार्यकाल में तत्कालीन वित्त मंत्रियों प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम ने उन पर अर्थव्यवस्था की हरी-भरी तस्वीर पेश करने के लिए दबाव बनाया था। किताब ‘जस्ट ए मर्सिनरी?: नोट्स फ्रॉम माई लाइफ एंड करियर’ में उन्होंने लिखा है कि इस कारण वे कई बार परेशान हुए। लेकिन वे अपने रुख पर अडिग रहे।

अपने तजुर्बे के आधार पर उन्होंने कहा है कि रिजर्व बैंक की स्वाययत्ता के मुद्दे पर सरकारों में समझदारी और संवेदनशीलता का अभाव है। यह रेखांकित वाली बात है कि तत्कालीन सरकार दबाव डालने से आगे नहीं बढ़ी। नतीजतन, सितंबर 2008 में गवर्नर बनने के बाद सितंबर 2013 तक का अपना कार्यकाल सुब्बाराव ने पूरा किया। लेकिन ये कहानी नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पलट गई। मोदी के कार्यकाल में पहले रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन के साथ सरकार का टकराव हुआ।

उनके बाद बने गवर्नर उर्जित पटेल को तो कार्यकाल के बीच में ही इस्तीफा देना पड़ा। फिर मोदी सरकार ने बिना वित्तीय पृष्ठभूमि वाले एक नौकरशाह को गवर्नर बना दिया। आज भारतीय रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है, ऐसा बहुत कम लोग ही मानते होंगे। इसका जो नुकसान भारतीय अर्थव्यवस्था को हुआ है, उसका आकलन लगना अभी बाकी है। बहरहाल, यह कहा जाएगा कि सुब्बाराव ने एक बहुत जरूरी विषय पर चर्चा छेड़ी है। अपनी किताब के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने जो कहा, उस पर भी भारतवासियों को अवश्य ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत जब दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, तभी एक गरीब देश ही रहेगा। उन्होंने ध्यान दिलाया कि आबादी अर्थव्यवस्था का आकार तय करने में एक पहलू होती है- इसलिए दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश का तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना अपने-आप में कोई उपलब्धि नहीं है। प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से भारत आज भी दुनिया में 139वें नंबर पर है। इसके साथ यह भी जोड़ा जा सकता है कि जीवन की गुणवत्ता के लिहाज से बहुसंख्यक भारतवासी आज भी बदहाल और अनिश्चितता भरी स्थितियों में जी रहे हैं।

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