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केजरीवाल के सियासी कार्ड

आम आदमी पार्टी को स्कूल, स्वास्थ्य, बिजली, पानी आदि की सेवाएं देने के काम आधार पर चुनाव जीतने का भरोसा नहीं है। तो वह हिंदुत्व की बहती गंगा में खुद को डूबा दिखाना चाहती है। पुजारी ग्रंथी सम्मान राशि योजना इसी की मिसाल है।

भाजपा और कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पर किसी प्रकार चुनाव जीतने के लिए बेताब होने का इल्जाम लगाया है, तो उस बात पर अनेक लोग अन्य लोग सहज यकीन करेंगे। केजरीवाल के हिंदू पुजारियों और सिख ग्रंथियों को 18 हजार रुपये हर महीने भत्ता देने के एलान को इसके अलावा किसी और रूप में नहीं देखा जा सकता। केजरीवाल ने पुजारियों और ग्रंथियों को ईश्वर का सेवक बताया। बहरहाल, उन्होंने चर्च में धार्मिक कार्य संपन्न कराने वाले पादरियों का कोई उल्लेख नहीं किया। वक्फ बोर्ड के तहत आने वाली मस्जिदों के इमामों को बोर्ड से तनख्वाह मिलने का प्रावधान है।

सोमवार को ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन ने प्रदर्शन आयोजित कर ध्यान दिलाया कि मौलवियों को 17 महीनों से ये रकम नहीं मिली है। इसके लिए एसोसिएशिन के प्रतिनिधि दिल्ली के उप-राज्यपाल एवं अन्य संबंधित अधिकारियों से भी मिल चुके हैं। मगर इस पर केजरीवाल उनकी पार्टी की सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। स्पष्टतः केजरीवाल रेवड़ी बांटने की अपनी रणनीति का दायरा बढ़ाने के साथ-साथ हिंदुत्व में अपनी “आस्था” के तत्व को भी चर्चा में लाने के प्रयास में हैं। इसके पहले चुनाव के बनते माहौल के बीच रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों का मसला उनकी पार्टी की सरकार उठा चुकी है। दिल्ली के स्कूलों में सख्त जांच के आदेश उसने दिए हैं, ताकि इन समुदायों के किसी बच्चे को वहां दाखिला ना मिले।

इन कदमों के पीछे मंशा साफ है। आम आदमी पार्टी को स्कूल, स्वास्थ्य, बिजली, पानी आदि की सेवाएं देने के अपने काम आधार पर चुनाव जीतने का भरोसा नहीं है। तो वह हिंदुत्व की बहती गंगा में खुद को डूबा दिखाना चाहती है। वैसे उसके इस तरह का अवसरवादी रुख दिखाने का यह पहला मौका नहीं है, फिर भी इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पूछा जा सकता है कि आज ऐसी कौन पार्टी है, जो इस गंगा में हाथ नहीं धोना चाहती? जवाब नकारात्मक मिलेगा। फिर भी हकीकत यही है कि भाजपा- यानी ऑरिजिनल के मैदान में रहते गैर-भाजपा दलों- यानी डुप्लीकेट्स को इस मुद्दे का लाभ मिलना मुश्किल ही बना रहा है।

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