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भारतीयों कुछ भी खा लेंगे?

अध्ययन में पाया गया कि भारत जैसे कम आय वाले देशों में जो खाद्य और पेय उत्पाद बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेच रही हैं, उनकी रेटिंग धनी देशों में बेचे जा रहे उत्पादों की तुलना में काफी कम है।

एक अध्ययन रिपोर्ट से सामने आया है कि दुनिया की 30 सबसे बड़ी खाद्य और पेय निर्माता कंपनियां भारत जैसे कम आय वाले देशों में ऐसे उत्पाद बेचती हैं, जो लोगों को स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। यह चिंताजनक जानकारी है। भारत सरकार और यहां के स्वास्थ्य विशेषज्ञों को रिपोर्ट में शामिल तथ्यों की गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए। अगर रिपोर्ट के निष्कर्षों में दम है, तो भारतीय कानून के दायरे में अधिकतम कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। मुनाफा बढ़ाने के लिए लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी कंपनी को नहीं दी जा सकती। नीदरलैंड्स की संस्था ‘एक्सेस टू न्यूट्रिशन इनिशिएटिव’ (एटीएनआई) के मुताबिक उसने नेस्ले, यूनीलीवर और पेप्सिको जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हजारों उत्पादों का अध्ययन किया। एटीएनआई की यह पांचवीं सूचकांक रिपोर्ट है।

संस्था के मुताबिक यह अब तक का उसका सबसे बड़ा आकलन है। संस्था ने उत्पादों की गुणवत्ता की जांच के लिए ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में तैयार हेल्थ स्टार रेटिंग (एचएसआर) प्रणाली का उपयोग किया है। इसके जरिए कुल 52,414 उत्पादों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि भारत जैसे कम आय वाले देशों में जो खाद्य और पेय उत्पाद बेचे जा रहे हैं, उनकी रेटिंग धनी देशों में बेचे जा रहे उत्पादों की तुलना में कम है। कम आय वाले देशों में इन कंपनियों के उत्पादों को पांच में से 1.8 की रेटिंग मिली, जबकि उच्च आय वाले देशों में उन्हें 2.3 रेटिंग दी गई। जिन उत्पादों को 3.5 से ज्यादा स्कोर मिलता है, उन्हें स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है।

इस रूप में ये कंपनियां धनी देशों में भी अपेक्षित मानदंड के मुताबिक उत्पाद नहीं बेच रही हैं। डिब्बाबंद खाद्यों और पेय के बारे में यह शिकायत रही है कि उनमें सोडियम, शक्कर और अन्य ऐसे तत्वों की मात्रा ज्यादा होती है। प्रीजर्वेटिव्स और स्वाद बढ़ाने के लिए केमिकल्स के इस्तेमाल के आरोप भी उन पर लगाते रहे हैं। लेकिन इन कंपनियों का रसूख ऐसा है कि वे सरकारों को प्रभावित कर लेती हैं। इसलिए उनके खिलाफ ठोस जांच नहीं हो पाती। लेकिन अब ये परिपाटी बदलने की अत्यधिक आवश्यकता है।

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