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उग्र राष्ट्रवाद के खतरे

संपादकीय-2
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यूरोप (दरअसल पूरी पश्चिमी दुनिया) ने प्रथम विश्वयुद्ध की शताब्दी मनाई। पेरिस में आर्क दे ट्रायंफ पर विश्व युद्ध की समाप्ति की 100 वीं वर्षगांठ मनाने के लिए फ्रांस और जर्मनी के नेताओं के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और भारतीय उप राष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू भी आए। समारोह की शुरुआत 11 बजे उसी समय होनी थी, जब सौ साल पहले मित्र राष्ट्रों और जर्मनी ने युद्ध विराम संधि पर दस्तखत किए थे। लेकिन कुछ नेताओं के देर से आने के कारण उसमें देरी हुई। पहले विश्व युद्ध में अनुमानतः 3.7 करोड़ आम लोगों और एक करोड़ सैनिकों की जान गई थी। पेरिस शहर भी इस युद्ध का एक प्रमुख लक्ष्य था, लेकिन 1914 में मित्र देशों की सेनाओं ने पेरिस पर कब्जा करने के जर्मन प्रयासों को विफल कर दिया था। 

पेरिस में हुए समारोह में बच्चों ने आठ भाषाओं में सैनिकों के लिखे गए पत्र पढ़े। संगीत का कार्यक्रम हुआ। फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने युद्ध खत्म होने की खुशी का वर्णन करते हुए युद्ध की विभीषिका और उसमें मारे गए और जख्मी हुए लाखों लोगों को याद किया। और इसके साथ उन्होंने जो कहा, उसका संदर्भ सिर्फ सौ साल पहले से नहीं था। बल्कि उन्होंने आज दुनिया में दिख रही प्रवृत्तियों पर कड़ी टिप्पणी की।  उन्होंने राष्ट्रवाद को देशभक्ति के साथ विश्वासघात बताया। फिर राष्ट्रों के बीच दोस्ती और संवाद की अपील की ताकि शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण हो सके। जब वे यह कह रहे थे, तब अमेरिकी राष्ट्रपति उन्हें देख रहे थे। माना गया कि मैक्रों का निशाना वही थे। मैक्रों ने कहा- "पुराने राक्षस फिर से सिर उठा रहे हैं। हमें अपने लोगों के सामने अपनी सच्ची और बड़ी जिम्मेदारी की पुष्टि करनी होगी।" पेरिस समारोह से पहले न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, भारत, हांग कांग, म्यांमार और दूसरे पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के समारोह हुए। इन देशों ने ब्रिटेन की ओर से लड़ते हुए युद्ध में अपने दसियों हजार सैनिक खोए थे। गौरतलब है कि ये समारोह ऐसे समय में हुआ जब दुनिया भर में उग्र राष्ट्रवाद पैर पसार रहा है और अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ रहा है। बहुत से लोग मानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने उग्र राष्ट्रवादी रुख से पश्चिमी देशों के गठबंधन और संयुक्त राष्ट्र जैसी विश्व संस्थाओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं। प्रथम विश्व युद्ध उग्र राष्ट्रवाद के प्रसार का ही परिणाम था। विडंबना है कि सौ साल बाद ये प्रवृत्ति फिर मजबूत हो गई है। 

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