देवभूमि में असुरक्षित महिलाएं

संपादकीय-2
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देवभूमि के नाम से मशहूर उत्तराखंड में एक आदमी के पेट्रोल हमले की शिकार छात्रा ने बीते रविवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया। करीब 80 फीसदी जली हालत में लड़की को नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया था। इस घटना के बाद एक बार फिर महिला सुरक्षा के सवाल पर बहस खड़ी हुई है। गौरतलब है कि दिल्ली के निर्भया कांड की बरसी के दिन यानी 16 दिसंबर को उत्तराखंड के पौड़ी जिले के एक ग्रामीण इलाके में 18 साल की वो छात्रा कॉलेज से घर लौट रही थी। उसके पीछे लगा 30 साल का टैक्सी चालक ने एक सुनसान मोड़ पर उसे रोकने और छेड़ने की कोशिश की। विरोध करने पर उसने छात्रा पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और उत्तराखंड पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर लगातार बढ़ रही है। जाहिर है कि इन आंकड़ों के पीछे जो भयानक सच्चाई है, वो बदस्तूर कायम है। बल्कि इसमें तेजी से इजाफा भी हुआ है। 2016 में इस राज्य में रेप के 187 मामले दर्ज किए गए थे। 2017 में 236 मामले दर्ज हुए। इस साल जुलाई तक का आंकड़ा ही 300 के पार जा चुका है। महिला उत्पीड़न के अन्य मामले भी कमोबेश इसी दर से बढ़ते हुए 300 के पार चले गए हैं। ज्यादातर आपराधिक वारदातें देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंहनगर में हुए हैं। पुलिस का कहना है कि बलात्कार के मामलों में कई शिकायतें फर्जी भी पाई गई हैं। लेकिन आम लोगों का यह तजुर्बा नहीं है। बल्कि वे इस पर चिंता जताते हैं कि कई संदिग्ध अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। उत्तरकाशी में पिछले दिनों एक नाबालिग लड़की से बलात्कार कर फिर उसकी हत्या कर दी गई थी। फिर इस अपराध को सांप्रदायिक और क्षेत्रवादी रंग देने की कोशिश भी हुई।

इनके खिलाफ छिटपुट आंदोलन ही हुए हैं। महिला उत्पीड़न पर भारत की छवि कोई अच्छी नहीं है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाल में हुए अध्ययनों और आंकड़ों में सामने आ चुका है कि औरतों के लिए यहां स्थितियां प्रतिकूल हैं। सवाल यह भी है कि आखिर पुलिस कब तक हर गली नुक्कड़ चौराहों से लेकर स्कूल-कॉलेज सुनसान तक महिलाओं की रक्षा करेगी। असल  समस्या है हमारा सामाजिक ढांचा। बेशक महिलाओं के प्रति व्यवहार और मानसिकता में बदलाव रातोंरात नहीं आएगा। लेकिन अफसोसनाक है कि ऐसा करने के कोई संगठित प्रयास होते भी  आज नहीं दिख रहे हैं।

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