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न्यायिक फैसले से मायूसी

संपादकीय-2
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इस फैसले से सिविल सोसायटी को मायूसी हाथ लगी है। यह उम्मीद करने का आधार था कि सुप्रीम कोर्ट भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं को राहत देगा। दरअसल, तीन सदस्यीय खंडपीठ में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इन आशाओं के मुताबिक ही अपना फैसला दिया। लेकिन वे अकेले पड़ गए। खंडपीठ ने बहुमत से दिए फैसले में सामाजिक कार्यकर्ताओं की हुई गिरफ्तारी की विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में लोगों की गिरफ्तारी उनकी असहमति की वजह से नहीं हुई है। जो भी आरोपी हैं, वो कानून में मौजूद प्रावधानों के तहत राहत पा सकते हैं। दो जजों ने कहा कि हम मामले के तथ्यों में जाना नहीं चाहते, क्योंकि यह पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है। कोर्ट ने चार हफ्ते तक कार्यकर्ताओं को नजरबंद रखने का आदेश दिया।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने दो सहयोगी जजों के फैसले से अलग फैसला दिया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह है कि क्या वे इस मामले में सही से जांच कर सकते हैं या नहीं। इसलिए एसआईटी जांच की जरूरत है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने असहमति वाले फैसले में कहा कि इन पांच कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी सत्ता द्वारा असहमति की आवाज दबाने का प्रयास है, जबकि असहमति ही जीवित लोकतंत्र की पहचान है। जस्टिस चंद्रचूड़ का कहना था कि समुचित जांच के बगैर ही पांच कार्यकर्ताओं पर जुल्म होने दिया गया, तो संविधान में प्रदत्त स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए याचिका को सही ठहराते हुए महाराष्ट्र पुलिस को प्रेस कांफ्रेस करने और उसमें चिट्ठियां वितरित करने के लिए आड़े हाथों लिया। कहा कि कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज के कथित पत्र टीवी चैनलों पर दिखाए गए।

पुलिस जांच के विवरण मीडिया को चुन-चुन कर देना उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है? इन गिरफ्तारियों के खिलाफ इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाजशास्त्री सतीश देशपांडे और मानवाधिकार कार्यकर्ता माया दारूवाला ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की थी। उन्होंने इन मानवाधिकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई तथा उनकी गिरफ्तारी की स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध किया था। अफसोसनाक है कि सुप्रीम कोर्ट ने ये याचिका मंजूर नहीं की। 

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