वैज्ञानिक चेतना की अनदेखी

संपादकीय-2
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पंजाब के जालंधर में हुई विज्ञान कांग्रेस में शामिल कुछ पर्चे अतीत के ऐसे निरर्थक, अहंकारी और अवैज्ञानिक गुणगान से भरे थे। ऐसी बातों से जिनका कोई ऐतिहासिक और वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है। इस तरह प्राचीन भारत के वास्तविक ज्ञान और अध्ययन मीमांसा के वृहद और गहन कार्यों को भी किनारे लगाने की कोशिश की गई। मसलन, एक कुलपति जी ने कौरवों की पैदाइश को स्टेम सेल रिसर्च और टेस्टट्यूब बेबी टेक्नॉलजी से जोड़ा। लक्ष्य भेद कर लौट आने वाले राम के अस्त्र-शस्त्र की चर्चा हुई। रावण के विभिन्न आकारों और क्षमताओं वाले 24 विमानों को ऐतिहासिक सचत बताया गया। दरअसल, ऐसे दावों की वहां झड़ी लग गई। एक वरिष्ठ वैज्ञानिक का दावा भी मीडिया में चर्चित रहा, जिसमें उन्होंने न्यूटन और आइंस्टाइन को ही धता बता दिया।

उनके मुताबिक न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण बलों की बहुत कम समझ थी और आइनस्टाइन ने तो अपने सापेक्षकता के सिद्धांत से दुनिया को गुमराह किया। वो यहीं पर नहीं रुके, बल्कि यह दावा किया कि आगे चलकर गुरुत्वाकर्षण तरंगों को प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर ‘नरेन्द्र मोदी तरंगे’ कहा जाएगा। एक अन्य पर्चे मे कहा गया कि डायनोसोर के बारे में भगवान ब्रह्मा को जानकारी थी। वेदों में उनका उल्लेख हो चुका है और ऐसा कुछ भी नहीं है जो ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्मा न जानते हों। यहां तक कहा गया कि राइट बंधुओं ने विमान का विचार रामायण काल के पुष्पक विमान से लिया था। 

विज्ञान कांग्रेस में ऐसी दलीलों का ये चलन 2015 से पहले शायद ही सुना गया हो। उस साल मुंबई कांग्रेस में बताया गया था कि भारत ने सात हजार साल पहले विमानों का आविष्कार कर लिया था। 2016 में मैसूर कांग्रेस के एक शोधपत्र में कहा गया कि अगर बाघ की खाल पर बैठकर योगाभ्यास करें, तो बुढ़ापा आएगा ही नहीं। 2018 में इम्फाल विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने दावा किया कि स्टीफन हॉकिंग ने सापेक्षता के सिद्धांत वेदों से लिया था। और इस बार तो पानी सिर के ऊपर से गुजर गया। अच्छी बात है कि अब बहुत से वैज्ञानिक और शोधकर्ता ऐसी बातों का विरोध करने लगे हैं। उनके मुताबिक ऐसे दावों के कारण पूरी दुनिया में भारतीय वैज्ञानिकों की मेधा, प्रतिभा और मेहनत पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि जब तक देश का सियासी माहौल नहीं बदलेगा, ऐसी चिताओं का कोई असर नहीं होगा।  

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