Loading... Please wait...

बदहाल होते सरकारी बैंक

संपादकीय-2
ALSO READ

आंकड़े खुद ये कहानी बयान कर रहे हैं। तीन जनवरी को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से जारी व्यवसायिक बैंक के बेसिक स्टैटिकल रिटर्न आंकड़ों पर गौर कीजिए। इसके मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में सरकारी बैंकों के सकल क्रेडिट में  63.2 फीसदी, वित्त वर्ष 2016-17 में 65.8 फीसदी और वित्त वर्ष 2015-16 में 68.1 फीसदी की कमी आई। जबकि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने इसी समय अवधि में अपनी स्थिति मजबूत की। प्राइवेट बैंकों के कुल क्रेडिट में क्रमशः 29.3 फीसदी, 26.7 फीसदी और 24.1 फीसदी की वृद्धि हुई। जमा राशि के मामले में भी सरकारी बैंकों की बाजार में हिस्सेदारी में कमी आई है। वित्त वर्ष 2017-18 में 69.4 फीसदी, वित्तीय वर्ष 2016-17 में 69.4 फीसदी और वित्त 2016 में 70.6 फीसदी कमी आई। जबकि प्राइवेट बैंकों की बाजार में हिस्सेदारी क्रमशः में 25.4 फीसदी, 23 फीसदी और 21.5 फीसदी बढ़ी। कुल मिलाकर एसेट क्वालिटी रिव्यू (एक्यूआर) और प्रोम्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के बाद सरकारी बैंक मुश्किल में हैं। अब जाहिर है कि ये लगातार प्राइवेट सेक्टर के बैंकों से पीछे छूट रहे हैं। पिछले तीन साल में जमा और उधार के साथ बाजार में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी लगातार घटी है। क्रेडिट और जमा राशि दोनों मोर्चों पर सरकारी बैंकों ने बनी-बनाई जमीन खोई है। जबकि प्राइवेट बैंक लगातार तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। आरबीआई बैंकों की बैलेंस सीट को जांचने के लिए एएसक्यू की प्रक्रिया अपनाती है। बैंकों को भारी घाटा होने की स्थिति में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। खस्ताहाल बैंकों की निगरानी, नियंत्रण और उनके हालात में सुधार लाने के लिए पीसीए के तहत आरबीआई निगरानी तंत्र विकसित करती है। एक्यूआर के बाद पीसीए के तहत लाए गए सरकारी बैंक नए लोन देने से बच रहे हैं।  

जांच का डर और कर्ज डूबने की आशंका की वजह से कई वाजिब कर्ज भी जारी नहीं किया जा सका है। इनका असर अब साफ होने लगा है। सरकारी बैंकों के कमजोर होने का सबसे बुरा असर प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में महसूस किया जा रहा है। जब बैंकों का यह हाल हो, तो अर्थव्यवस्था के सुधरने की आशा निराधार ही है। एक खबर यह है कि सरकारी बैंक अब विदेशों में स्थित अपनी शाखाओं में कटौती करने वाले हैं। तीन बैंकों- बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक- के विलय को सरकार पहले ही मंजूरी दे चुकी है। ये सब बढ़ते संकट का संकेत हैं। ये कुल मिलाकर पूरी अर्थव्यवस्था के गहराते संकट की तरफ इशारा करते हैँ। 

88 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech