नाराज होते मजदूर-किसान

संपादकीय-2
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नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ देशभर के मजदूर-किसान एकजुट हो रहे हैं। ऐसा संकेत पिछले डेढ़ साल के दौरान कई बार मिला है। उनकी एकता की  ताजा मिसाल 8 से 9 जनवरी को दो दिन की देशव्यापी हड़ताल है। किसान संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने इस दो दिन की हड़ताल का आह्वान किया था। किसान संगठन ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ ने दो दिवसीय ग्रामीण भारत बंद का आयोजन किया। मजदूर संगठन इससे जुड़े। उन्होंने भी आम हड़ताल की अपील की। कहा गया कि ग्रामीण भारत बंद और ट्रेड यूनियन हड़ताल उद्योगपतियों की समर्थक और जन विरोधी बीजेपी सरकार के खिलाफ किसानों और मजदूरों की एकजुट कार्रवाई है। भूमि अधिकार सभा ने भी इस बंद का समर्थन किया। भूमि अधिकार सभा कई ऐसे संगठनों का समूह है, जो गरीब भूमिहीन किसानों के लिए जमीन की मांग करते हैं। हड़ताल आयोजित करने वाले स गठनों ने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के प्रति अपनी निराशा जताने के लिए किसान सड़क जाम करेंगे और प्रदर्शनों में शामिल होंगे। यह तो निर्विवाद है कि देश इस समय गंभीर कृषि और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है।

किसानों और खेतों में काम करने वाले मजदूरों की हालत बहुत खराब है, लेकिन सरकार की ओर से उन्हें बहुत थोड़ी मदद ही मिली है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2013 से 2016 के बीच 48 हजार से अधिक किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। जानकार तो अब यह कहने लगे हैं कि भारत की कृषि समस्या खेती से परे जा चुकी है। यानी इसका समाधान खेती से बाहर जाकर ढूंढना होगा। लेकिन ऐसा होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। बीते एक साल में देश की राजधानी किसानों के तीन बड़े आंदोलनों का गवाह बन चुकी है। अगस्त, अक्टूबर और नवंबर में दिल्ली में हुए इन प्रदर्शनों में पांच लाख से ज्यादा किसानों ने किसान विरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ आंदोलन किया। उधर भाजपा सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही मजदूरों से संबंधित कानूनों को ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर लगातार खत्म किया जा रहा है। ट्रेड यूनियनें लेकर विरोध जताती रही हैं। नवंबर 2017 में तीन लाख से अधिक कामगारों ने मजदूर अधिकारों के हनन के विरोध में महापड़ाव आयोजित किया था। ताजा हड़ताल को उसी सिलसिले में देखा जाएगा। इससे यह संदेश गया है कि श्रमिक वर्ग सरकार के खिलाफ होता जा रहा है।

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