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महिलाओं से ही क्यों सवाल

संपादकीय-2
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अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का कहना है कि मर्दों के लिए बेहद खतरनाक वक्त चल रहा है। संदर्भ है मी-टू मूवमेंट का। ट्रंप ने कहा कि 30-35 साल तक आप प्रतिष्ठित काम करते हैं और फिर अचानक ही कोई आता है और कहता है कि आपने ये किया था या वो किया था। वो अपने साथ तीन गवाह भी ले आता है। अब आप जब तक खुद को निर्दोष साबित नहीं कर देते हैं, आप गुनहगार हैं। मामला अमेरिका के एक जज ब्रेट केवेनॉ से जुड़ा है। डॉनल्ड ट्रंप ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नामांकित किया। लेकिन वे नियुक्त किए जाते, इससे पहले ही क्रिस्टीन फोर्ड नाम की एक महिला ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। महिला के अनुसार ब्रेट केवेनॉ ने 80 के दशक में उनके साथ जोर जबरदस्ती की। उस समय वे दोनों हाई स्कूल में थे। इसके बाद दो और महिलाओं ने उन पर आरोप लगाए। केवेनॉ खुद को बेकसूर बताते हैं।

उन्हें राष्ट्रपति का समर्थन भी हासिल है। ट्रंप का कहना है कि यह विपक्ष की साजिश है। मगर ट्रंप की बात का मतलब यह हुआ कि अगर कोई पुरुष एक ऊंचे ओहदे तक पहुंच चुका है, समाज की नजरों में "इज्जत" कमा चुका है, तो यह माना जाए कि वो कोई गलत काम नहीं कर सकता। और अगर कोई महिला सालों बाद अपने साथ हुई गलत हरकत के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करती है, तो वो झूठ बोल रही है। मगर ट्रंप विरोधियों की राय है कि मी-टू मूवमेंट के बाद से जितने "प्रतिष्ठित पुरुषों" के नाम सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए यौन पीड़ितों का समर्थन करना और भी ज्यादा जरूरी जाता है? सवाल उठाया गया है कि ट्रंप के शब्दों का क्या मतलब हुआ? क्या वे अतीत में किए गए अपने अपराधों पर पर्दा डालने के लिए ऐसा कह रहे हैं? ये बात अपने देश में भी उठी है। कहा गया है कि अमेरिका हो या भारत, लड़ाई वही है।

कहीं अभिनेत्री तनुश्री दत्ता से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं कि दस साल तक कहां थीं, तो कहीं क्रिस्टीन फोर्ड से कि 35 साल बाद क्यों नींद से जगीं। कहीं भी महिलाओं को उनके साहस के लिए सराहा नहीं जा रहा है। पूरी दुनिया के सामने खुद के साथ हुई घटनाओं को दोहराने की हिम्मत जुटाने के लिए उन्हें शाबाशी नहीं दी जाती, बल्कि उन्हीं के चरित्र पर सवाल किए जाते हैं। क्या पुरुष वर्चस्व को साबित नहीं करता?
 

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