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दवा कंपनियों को छूट क्यों?

संपादकीय-2
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दवाओं के क्लीनिकल परीक्षण के लिए नियम बने, यह मांग अब बरसों पुरानी हो चुकी है। न्यायपालिका ने भी कई बार दखल दिया। लेकिन यह दवा कंपनियों का रसूख और असर ही है कि आज तक ऐसा नहीं हुआ। नतीजतन, पिछले हफ्ते एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट को ये निर्देश देना पड़ा कि मनुष्यों पर दवाओं के क्लीनिकल परीक्षणों को नियंत्रित करने के लिये नियम बनाए जाएं। इन परीक्षणों का लोगों की सेहत पर गंभीर असर होता है। केंद्र ने अदालत को बताया कि उसने इस साल फरवरी में क्लीनिकल परीक्षणों के बारे में नियमों का मसौदा जारी किया था। उसमें ऐसे परीक्षणों के पीड़ितों को पांच से 75 लाख रुपये तक मुआवजा देने की बात शामिल थी। इसके मद्देनजर जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे इस मसौदे पर अपनी आपत्तियां और सुझाव सरकार को दें, ताकि उन पर विचार किया जा सके। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अनेक दवा निर्माता कंपनियां देश भर में बड़े पैमाने पर मनुष्यों पर दवाओं का क्लीनिकल परीक्षण कर रही हैं।

इनमें अनेक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। देश के अनेक राज्यों में दवा निर्माता कंपनियां मनमाने तरीके से दवाओं के ऐसे परीक्षण कर रही हैं। विशेषज्ञों को आपत्ति यह है कि दवाओं के क्लीनिकल परीक्षण के मुद्दे को नियंत्रित करने के लिए तैयार नियमावली में लोगों को महज एक ‘विषय’ के रूप में लिया गया है। यानी मानवीय पक्ष की उपेक्षा की गई है। इन परीक्षणों की वजह से होने वाली मौत के सवाल को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया गया है। पहले तो हालत यह थी कि लोगों को जानकारी दिए बगैर ही उन पर ये परीक्षण किए जा रहे थे। कोर्ट ने कहा है कि अंतत: केंद्र और राज्य सरकारों को ही नियम बनाने होंगे और उन पर अमल सुनिश्चित करना होगा।

मगर ये शिकायत आम है कि राज्य सरकारें खुद कानून का उल्लंघन कर रही हैं। नतीजतन, क्लीनिकल परीक्षणों की वजह से अनेक लोग जान गंवा चुके हैं। इस संबंध में संसदीय समिति की 2012 और 2013 की रिपोर्ट का भी हवाला जा सकता है। गौरतलब है कि इस काम में लगी मल्टीनेशनल कंपनियों को क्लीनिकल परीक्षण के पीड़ितों को मुआवजा देने से बाहर रखा जाता है। इन कंपनियों से ठेकेदार के रूप में जुड़ी इकाइयों को ही मुआवजे के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। अब ये मामला फिर उठा है, अपेक्षित है कि सरकारें कम-से-कम अब अपनी नींद तोड़ें। 

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