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खुदकुशी पर लगाम नहीं

संपादकीय-2
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कोटा में पिछले साल वहां कुल 19 छात्रों ने मौत को गले लगाया। पुलिस के अनुसार आत्महत्या की घटनाओं में वहां बढ़ोतरी हुई है। कोटा में पुलिस, प्रशासन, कोचिंग संस्थान ने छात्र-छात्राओं में पढ़ाई का तनाव कम करने के बहुत से प्रयास किए, लेकिन घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में नामांकन कराने के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए देशभर से हर साल करीबन दो लाख छात्र कोटा आते हैं। लेकिन एंट्रेस टेस्ट पास करने के दबाव में पिछले कुछ वर्षो में काफी छात्रों ने आत्महत्या की है, जिसके लिए अत्यधिक मानसिक तनाव को कारण माना जाता है। कोटा में सफलता का स्ट्राइक तीस फीसदी से ऊपर रहता है। इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप-10 में से कम से पांच छात्र कोटा के ही रहते हैं। लेकिन कोटा का एक और सच भी है। यह बेहद भयावह है। एक बड़ी संख्या उन छात्रों की भी है जो नाकाम हो जाते हैं। उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी असफलता बर्दाश्त नहीं कर पाते। नतीजतन कोचिंग की मंडी बन चुका कोटा शहर अब आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यहां शिक्षा के बजाय सपने बेचने का कारोबार हो रहा है, जो मौत में तब्दील हो रहा है। 

कोटा पुलिस के अनुसार साल 2018 में 19 छात्र, 2017 में सात छात्र, 2016 में 18 छात्र और 2015 में 31 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया। 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो 2013 की अपेक्षा लगभग 61.3 प्रतिशत ज्यादा थी। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक मोबाइल पोर्टल और ऐप लाने का इरादा जताया है, ताकि इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए कोचिंग की मजबूरी खत्म की जा सके। इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम, आयु, अवसर और परीक्षा का ढांचा कुछ ऐसा है कि छात्रों के सामने कम अवधि में कामयाब होने की मजबूरी होती है। इसलिए वे कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या मोबाइल पोर्टल और ऐप की सुविधा से इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी में लगे विद्यार्थियों के सामने कोचिंग से बेहतर विकल्प खुलेंगे? फिलहाल कहना मुश्किल है। कोटा की सफलता की बड़ी वजह यहां के शिक्षक हैं। क्या ऐप उनका विकल्प होंगे? असली समस्या समाज की आंधी दौड़ है। जब तक इसका कोई हल नहीं होता, शायद ये मसला हल नहीं होगा। 

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