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जासूसी और सवाल

संपादकीय-2
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हाल में सैन्य और रक्षा प्रतिष्ठानों की जासूसी के जो मामले सामने आए हैं, वे चिंताजनक हैं। कुछ दिन पहले ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना से जुड़े एक इंजीनियर को गिरफ्तार किया गया था, जिस पर इस परियोजना से जुड़ी अहम जानकारियां अमेरिका और पाकिस्तान को देने का आरोप है। इसी से जुड़े मामले में अब मेरठ से सेना के एक जवान को पकड़ा गया है, जिस पर ब्रह्मोस से जुड़ी जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचाने का आरोप है। कहा जा रहा है कि हनीट्रैप के जाल में फंसे लोग जासूसी को अंजाम दे रहे हैं। पाकिस्तान की खुफिया एजंसी आएसआइ ने पिछले कुछ सालों से महिलाओं के नाम पर फर्जी फेसबुक अकाउंट बना कर भारत के सैन्य और रक्षा प्रतिष्ठानों में सेंध लगाई है। हनीट्रैप के मामले में ही पिछले साल वायु सेना के एक अधिकारी को गिरफ्तार किया गया था। इन घटनाओं से एक सवाल भी यह उठता है कि क्या हमारे सैन्य और रक्षा प्रतिष्ठानों का सूचना तंत्र क्या इतना कमजोर है कि दूसरे देश आसानी से हमारी तंत्र में सेंध लगा लेते हैं। शायद ही कोई साल ऐसा गुजरता हो जब इस तरह की दस-बारह घटनाएं सुनने-पढ़ने में न आती हों। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। हर देश एक-दूसरे की जासूसी करता है। रक्षा-सुरक्षा की जासूसी सदियों से चली आ रही है। ऐसे में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम अपना तंत्र कैसे मजबूत बनाएं, ताकि दुश्मन चाहते हुए भी कुछ हासिल न कर सके। और यह असंभव नहीं है। जैसे नासा या रूस के संस्थानों की जासूसी असंभव है, वैसा ही अभेद्य तंत्र हम भी खड़ा कर सकते हैं। उसके लिए इच्छा शक्ति की जरूरत होती है।

हालांकि जासूसी से जुड़े मामलों में कई बार यह भी देखने में आया है कि कई सालों की जांच और मुकदमों के बाद आरोपी निर्दोष साबित होते हैं और नतीजा यह निकलता है कि जो मामला बनाया गया था, वह हकीकत में था ही नहीं। इसरो जासूसी कांड इसका ताजा उदाहरण है। इस कांड में देश के मशहूर वैज्ञानिक नांबी नारायण, उनके एक साथी वैज्ञानिक और एक आरोपी महिला को पच्चीस साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष करार दिया। नांबी नारायण क्रोयोजनिक इंजन परियोजना के प्रमुख थे। इस कांड की जिस तरह जांच हुई और जैसी इसमें राजनीति हुई, उससे देश के एक वैज्ञानिक का करिअर तबाह हो गया। ऐसे में जासूसी के मामले कहीं न कहीं संदेह पैदा करते हैं। यह पक्ष भी विचारणीय है।

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