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अवैध खनन का साथ

संपादकीय-2
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गोवा में अवैध खनन का मामला सबसे पहले यूपीए के शासनकाल में उठा था। इस मामले ने तब खूब जोर पकड़ा। गोवा में हुए सत्ता बदल में इसकी भूमिका रही। लेकिन सत्ता बदलने से गोवा में अवैध खनन नहीं रुका। हाल में ये मामला फिर सुर्खियों में तब आ गया, जब पिछले दिनों पता चला कि गोवा सरकार ने कथित तौर पर खनन कानून में संशोधन का केंद्र से आग्रह किया है। जबकि केंद्रीय कानून मंत्रालय ने सरकार से कहा है कि वो ऐसा न करे। कानून मंत्रालय का साफ कहना है कि ये विधायी दायरे से बाहर का मामला हो गया है। अगर कंपनियों और गोवा सरकार को लगता है कि काम शुरू हो, तो वे सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। उधर गोवा में खनन कार्य से जुड़े लोगों का मोर्चा दिसंबर में दिल्ली पहुंचकर विरोध प्रदर्शन की तैयारी में है। खनन अधिनियम में संशोधन की मांग और इसे लेकर कानून मंत्रालय की आपत्ति की खबर आने के बाद गोवा के राजनीतिक हल्कों में गहमागहमी बढ़ी। गोवा के मुख्यमंत्री ने फिलहाल केंद्र से एमएमडीआर एक्ट (माइन्स ऐंड मिनरल्स) में संशोधन की अपील की है ताकि खदान की लीज की अवधि 2037 तक खिंच जाए और खनन कंपनियां अपना काम दोबारा शुरू कर सकें। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल राज्य सरकार द्वारा 88 खनन कंपनियों को जारी नई लीज को निरस्त कर दिया था। गोवा के पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर खदान कार्य का गहरा प्रभाव पडा है। खेतिहर इलाके और हरियाली नष्ट हुई है। पश्चिमी घाटों का एक प्रमुख हिस्सा भी गोवा में जारी निर्माण कार्यों से प्रभावित बताया जाता है। खनन गोवा के राजस्व का प्रमुख स्रोत रहा है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण की बर्बादी भी हुई है, जिसे लेकर पर्यावरणविदों के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता भी लंबे समय से मुखर रहे हैं। खनन को लेकर आंदोलनों का एक लंबा इतिहास है। अक्टूबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने गोवा के तमाम लौह अयस्क खनन और परिवहन पर रोक लगाने का आदेश दिया था। लेकिन 2015 में राज्य की भाजपा सरकार ने 88 खनन कंपनियों की लीज को फिर से बहाल कर दिया। इस साल फरवरी में गोवा फाउंडेशन नाम के एनजीओ की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमाम नई लीज रद्द करते हुए कहा था कि पर्यावरणीय हरी झंडी के बाद ही नई लीज की जा सकती हैं। अब गोवा सरकार कानून बदलवाने पर आमादा है।  

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