Loading... Please wait...

अब 'मिनी मैर्केल' का दौर!

संपादकीय-2
ALSO READ

पिछले हफ्ते जर्मनी में आनेग्रेट क्रांप-कारेनबावर को सत्ताधारी सीडीयू पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया। वे पार्टी अध्यक्ष के रूप में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल का स्थान लेंगी। क्रांप-कारेनबावर मैर्केल की करीबी रही हैं। लेकिन अब उन्होंने कहा है कि उनकी अपनी शख्सियत है। उन्हें 'मिनी मैर्केल' ना समझा जाए। अब तक पार्टी में महासचिव के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहीं क्रांप-कारेनबावर ने मतदान के दूसरे राउंड में फ्रीडरिष मैर्त्स को हराकर जीत हासिल की। तीसरे दावेदार येन्स श्पान पहले ही दौर में पिछड़ गए। हालिया प्रांतीय चुनावों में सीडीयू पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद मैर्केल ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने का फैसला किया था। इस पद पर वे साल 2000 से काबिज थीं। पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने के बावजूद मैर्केल चांसलर पद पर बनी रहेंगी। क्रांप-कारेनबावर इससे पहले जर्मन राज्य जारलैंड में 2011 से 2018 तक मुख्यमंत्री का पद संभाल चुकी हैं। पार्टी अध्यक्ष पद के लिए वे मैर्केल की पसंदीदा उम्मीदवार थीं। इसी साल फरवरी में उन्होंने सीडीयू के महासचिव का पद संभाला था। फिलहाल सीडीयू को देश में केवल 30 फीसदी समर्थन हासिल है, जबकि मैर्केल के सुनहरे दिनों में यह समर्थन 40 फीसदी तक हुआ करता था। बहुत से समर्थक दक्षिणपंथ की ओर झुक गए हैं। बहुत से वामपंथी राजनीति करने वाली ग्रीन पार्टी की ओर चले गए हैं। अगले साल मई में यूरोपीय संसद के चुनाव होने हैं, जिसके पहले जर्मनी को अपनी एकता का प्रदर्शन करना होगा।

यूरोप की सबसे प्रभावशाली नेता के तौर पर सालों साल जानी जाती रहीं मैर्केल के खुद के राजनीतिक भविष्य के लिए भी नया उत्तराधिकारी अहम होगा। इससे तय होगा कि वे 2021 तक अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद राजनीति छोड़ने की अपनी योजना को अमली जामा पहना पाएंगी या नहीं। पिछले कई सर्वेक्षणों से 64 वर्षीया मैर्केल की घटती लोकप्रियता का पता चल रहा है। इसका कारण मुख्य रूप से शरणार्थियों के लिए उनकी उदार नीति को माना जाता है। हैम्बर्ग में सीडीयू के सम्मेलन में पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उनके आखिरी भाषण के बाद पूरी सभा ने करीब 9-10 मिनट तक उनके लिए खड़े होकर तालियां बजाईं। 2005 से ही जर्मनी का नेतृत्व करने वाली मैर्केल लगातार देश को मध्यमार्गी राजनीति की ओर ले आई हैं। परिवार के लिए ज्यादा छुट्टियां दिलाना, परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल रोकना और सेना में अनिवार्य सेवा खत्म करने जैसी नीतियां उनके समय को परिभाषित करती हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अब इनके दिन लद गए हैँ।

52 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech