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यूरोप में पड़ेगी फूट?

संपादकीय-2
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आखिरकार यूरोपीय संसद ने एक साहसी कदम उठाया है। उसने हंगरी पर कार्रवाई करने का फैसला किया है। गौरतलब है कि हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान की सरकार द्वारा लोकतांत्रिक संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई, मीडिया स्वतंत्रता पर हमला और अल्पसंख्यकों के हकों में कटौती यूरोप में तीखी बहस का मुद्दा रहा है। अब यूरोपीय संसद में दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने हंगरी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का पक्ष लिया। यूरोपीय संघ के किसी देश के खिलाफ ऐसा मतदान पहली बार हुआ। यूरोपीय संघ की संधि के अनुच्छेद सात के तहत कार्रवाई शुरू करने के प्रस्ताव के समर्थन में 488 और उसके खिलाफ 197 मत पड़े। यह अनुच्छेद इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस प्रक्रिया के अंत में यूरोपीय संघ में हंगरी से मतदान का अधिकार छीना जा सकता है। धारा सात के तहत किसी भी सदस्य देश के खिलाफ कार्रवाई का शुरू करने का अधिकार यूरोपीय संसद के अलावा यूरोपीय आयोग और सदस्य देशों को है।

इससे पहले यूरोपीय आयोग ने पोलैंड के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। हंगरी के खिलाफ यूरोपीय संघ के एकजुट हो जाने पर पोलैंड ने चिंता जाहिर की है। उसने कहा कि वह हंगरी पर प्रतिबंधों का विरोध करेगा। पोलैंड के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि हर देश को घरेलू सुधार करने का संप्रभु हक है। पोलैंड की राय में किसी सदस्य देश के खिलाफ ऐसे कदम ईयू में विभाजन को गहरा बनाएंगे। यूरोपीय संस्थाओं में नागरिकों का अविश्वास बढ़ेगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस मतदान को ऐतिहासिक बताया है। यूरोपीय संसद का यह फैसला ग्रीन पार्टी की सांसद यूडिथ सार्गेंटिनी की हंगरी पर एक रिपोर्ट के बाद आया। उन्होंनेने अपनी रिपोर्ट में ओरबान सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन कई मामलों का आरोप लगाया, जिसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमले के अलावा मीडिया स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों में कटौती भी शामिल है। हंगरी ने ओरबान के शासनकाल में गैर सरकारी संस्थाओं के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए हैं।

हंगरी के प्रधानमंत्री ओरबान ने हंगरी का बचाव करने के बदले यूरोपीय संसद में इस तरह की वोटिंग को हंगरी की जनता का अपमान कहा था। हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिजार्टो ने इस मतदान को रिफ्यूजी समर्थक नेताओं का बदला बताया। 2015 के शरणार्थी संकट के बाद से ही हंगरी यूरोप आने वाले शरणार्थियों को कोटे के आधार पर लेने से मना करता रहा है। इस पर जागरूक और संवेदनशील यूरोप की ताजा प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। 

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