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घातक है वायु प्रदूषण

संपादकीय-2
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दिल्ली पर फिर से धुंध का चादर छाई है। अब ये हर साल की कहानी है। लेकिन इसका कोई समाधान निकलता नहीं दिखता। नतीजा है कि वायु प्रदूषण लगातार अधिक घातक होता जा रहा है। इसकी तस्दीक विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण और बच्चों के स्वास्थ्य पर जारी ताजा रिपोर्ट से भी हुई है। उसके अनुसार  दुनिया भर में 18 साल से कम उम्र के 93 फीसदी लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। 2016 में वायु प्रदूषण से होने वाले सांस संबंधी बीमारियों की वजह से दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के 5.4 लाख बच्चों की मौत हुई है।  वायु प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य के लिये सबसे बड़ा खतरा बन गया है। पांच साल से कम उम्र के 10 बच्चों की मौत में से एक बच्चे की मौत प्रदूषित हवा की वजह से हो रही है। भारत में हालत ज्यादा खराब है। दरअसल, डब्लूएचओ की इस रिपोर्ट ने इसी साल जनवरी में ग्रीन पीस इंडिया की जारी रिपोर्ट में प्रदूषित हवा का बच्चों पर असर को लेकर जाहिर चिंता को और ज्यादा मजबूत किया है। एक बार फिर यह सामने आया है कि गरीब और मध्यम आयव र्ग के देश बाहरी और घरेलू दोनों तरह के वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित है।

चिंताजनक है कि भारत जैसे देश में लगभग पूरी जनसंख्या डब्लूएचओ और राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानको से अधिक प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है। ग्रीनपीस ने वैश्विक स्तर पर उपग्रह से हासिल आंकड़ों पर आधारित विश्लेषण को प्रकाशित किया था। उसमें बताया गया कि कोयला और परिवहन उत्सर्जन के दो प्रमुख स्रोत हैं। नाइट्रोजन डॉयक्साइड  भी पीएम 2.5 और ओजोन के बनने में अपना योगदान देता है, ये दोनों वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक रूपों में बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इस साल सबसे ज्यादा नाइट्रोजन डॉयक्साइड वाले क्षेत्रों में दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, भारत और चीन के नाम सबसे ऊपर हैं। ये क्षेत्र कोयला आधारित पावर प्लांट के लिए जाने जाते हैं। भारत में दिल्ली-एनसीआर, सोनभद्र- सिंगरौली, कोरबा तथा ओडीशा का तेलचर क्षेत्र ऐसे 50 शहरों की सूची में शामिल हैं। ये तथ्य साफ-साफ बता रहे हैं कि ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन जलने का वायु प्रदूषण से सीधा-सीधा संबंध है। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह कठोर नीतियों और तकनीक को अपनाकर अ हवा को साफ करने के कदम उठाए। लेकिन ऐसा नहीं दिख रहा है।

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