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खतरे में बोलने की आजादी?

संपादकीय-2
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अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर दुनिया में भारत की छवि बिगड़ रही है। इसका एक प्रमाण एमनेस्टी इंटरनेशन का ताजा बयान है। एमनेस्टी की भूमिका विवादित रही है, लेकिन यह हकीकत है कि उसकी बातों को दुनिया में ध्यान से सुना जाता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने पिछले हफ्ते कहा कि पत्रकार गौरी लंकेश की बेंगलूर में उनके घर के बाहर गोली मारकर की गई हत्या के एक साल बाद भी हालत नहीं बदली है। कई पत्रकारों को जान से मारने की धमकियों, हमलों और फर्जी आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। एमनेस्टी ने इस निष्कर्ष पर है कि यह भारत में सत्ता से सच कहने के लिहाज से यह खतरनाक समय है। मानवाधिकार संगठन ने कहा कि पत्रकारिता पर हमले से न केवल बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार गला घोंटा जाता है, बल्कि लोगों को चुप कराने पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ता है।

नक्सलियों से संबंध के आरोप में नजरबंद किए गए पत्रकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का उदाहरण देते हुए इस संस्था ने कहा कि यह अभिव्यक्ति की आजादी का दमन है। गौरी लंकेश की पिछले साल पांच सितंबर को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में गिरफ्तार किए गए कुछ लोगों के संबंध हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े बताए जा रहे हैं। मामले में गिरफ्तार किये गए कुछ लोगों का नाम कथित तौर पर सनातन संस्था और उससे जुड़ी हिंदू जनजागृति समिति से जुड़ा हुआ है। पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड की जांच कर रही एसआईटी कहा है कि इस मामले में जांच अंतिम चरण में है। दो महीने के अंदर आरोप-पत्र दाखिल कर दिया जाएगा। एमनेस्टी इंडिया ने कहा है कि गौरी लंकेश हत्याकांड की जांच में प्रगति होती लग रही है, लेकिन कई अन्य पत्रकारों एवं घोटालों का खुलासा करने वालों पर हुए हमलों की जांच में शायद ही कुछ हुआ है।

इसके पहले ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ नामक संस्था ने कहा था कि 2018 के पहले छह महीने में भारत में कम से कम चार पत्रकार मारे गए और कम से कम तीन अन्य पर हमला हुआ। एमनेस्टी ने कहा कि सरकार की आलोचना वाली पत्रकारिता करने वाले कई अन्य पत्रकारों को भी धमकियां मिली हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2014 और 2017 के बीच में मीडिया पर्सन्स के खिलाफ 204 हमले दर्ज किए गए। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों के बीच भारत की स्थिति 2017 में 136 से बढ़कर 2018 में 138 हो गई है।
 

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