सुप्रीम कोर्ट की जरूरी सख्ती

सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से पर्यावरण के लिए चिंतित लोगों को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने हरियाणा सरकार के खिलाफ जो सख्ती दिखाई, दरअसल उससे पर्यावरणवादी कार्यकर्ता खुश हैं। वे उम्मीद कर रहे हैं कि इससे विभिन्न सरकारों को उचित संदेश जाएगा। पिछले हफ्ते अरावली में निर्माण को मंजूरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार के खिलाफ कड़ी नाराजगी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार से कहा कि आदेशों के खिलाफ वह नया कानून लागू करने की कोशिश न करे। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी हिमाकत करने पर सरकार के खिलाफ अवमानना का केस चलेगा। जस्टिस अरुण मिश्र की अगुआई वाली बेंच ने राज्य सरकार को फटकारते हुए कहा- आप सुप्रीम नहीं हैं, कानून का शासन ही सर्वोपरि है। आप जंगल को नष्ट कर रहे हैं। यह स्वीकार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम जानते हैं कि इस कानून के ज़रिए हरियाणा सरकार अरावली और नीलगिरी की पहाड़ियों में वन नियमों को ताक पर रखकर किए गए अवैध निर्माण को मान्यता देने का रास्ता साफ कर रही है। इस नए कानून के ज़रिए सत्ताधारी अपने चहेते लोगों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कोई भी कानून से ऊपर नहीं हो सकता है। यह गंभीर मामला है। 

गौरतलब है कि अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन के चलते राजस्थान के अरावली क्षेत्र से 31 पहाड़ियां विलुप्त होने पर हैरानी जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में अरावली की पहाड़ियों पर अंधाधुंध खनन पर सख्त नाराजगी जताते हुए सरकार से 48 घंटों में खनन रोकने को कहा था। सुनवाई के दौरान जस्टिस मदन भीमराव लोकुर ने कहा था कि एप्का की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा की सीमा वाले इलाकों से 31 पहाड़ गायब हो गए हैं। आखिर जनता में तो हनुमान की शक्ति नहीं आ सकती कि वो पहाड़ ही ले उड़ें। ऐसे में इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ अवैध खनन ही है। कोर्ट के पूछने पर राजस्थान सरकार ने भी ये माना था कि अरावली में 115.34 हेक्टेयर जमीन पर खनन हुआ। इस मामले में ये खुलासा हुआ है कि कैसे सरकारें निहित स्वार्थी तत्वों का संरक्षक बनी रहती हैं। इस क्रम में पर्यावरण या अन्य सार्वजनिक हितों की घोर अवहेलना होती है। अरावली का मामला ऐसा ही है। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट के रुख से आम लोगों ने राहत महसूस की है।

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