सरकार को तगड़ा तमाचा

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को पद पर बहाल कर दिया। जाहिर है, यह केंद्र सरकार के लिए बड़ा झटका है। वैसे कोर्ट ने कहा कि वर्मा फिलहाल कोई कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं ले सकते। उनके मामले उच्च स्तरीय समिति विचार करेगी। प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता इस समिति के सदस्य होते हैं। समिति को इस मामले पर एक हफ्ते में निर्णय लेने के लिए कहा गया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगाई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ की खंडपीठ के इस फैसले के मुताबिक आलोक वर्मा को अवकाश पर भेजने का केंद्र सरकार का फैसला गलत था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कहा कि उन्हें निदेशक पद से प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस वाली उच्च स्तरीय समिति की मंजूरी लिए बिना नहीं हटाया जाना चाहिए था। डीएसपीई एक्ट के तहत न तो सरकार और न ही सीवीसी को यह अधिकार है कि वह निदेशक को उसके पद से हटा सके। यह महत्त्वपूर्ण निर्णय है। गौरतलब है कि आलोक वर्मा ने केंद्र सरकार के उन्हें अवकाश पर भेजने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसके पहले वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग सार्वजनिक हो गई थी। इसके बाद सरकार ने दोनों अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेज दिया था। दोनों अधिकारियों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। वर्मा ने अपनी याचिका में 23 अक्टूबर 2018 के सतर्कता आयोग (सीवीसी) के एक और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के दो आदेशों को निरस्त करने की गुजारिश की थी।

उनका आरोप था कि ये आदेश क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर दिए गए हैं। उन्होंने इन्हें संविधान के अनुच्छेदों 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताया था। वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेजने के बाद केंद्र सरकार ने एम. नागेश्वर राव को सीबीआई का अस्थायी तौर पर कार्यभार सौंप दिया था। इन फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं। उनमें न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दल से इस पूरे मामले की जांच की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपने फैसले को वर्मा को जबरन तबादले पर भेजने संबंधी कदम तक ही सीमित रखा है। इससे विनीत नारायण मामले में दो दशक पहले आए फैसले की पुनर्पुष्टि की गई है। यह राहत की बात है।

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