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पारदर्शिता की ऐसी प्राथमिकता!

चौतरफा आलोचना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद आखिरकार केंद्र सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में चार नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर दी है। आयोग के वरिष्ठ सूचना आयुक्त सुधीर भार्गव को मुख्य सूचना आयुक्त बना दिया गया है। गौरतलब यह है कि नियुक्त सभी आयुक्त नौकरशाह हैं। नौकरशाहों से नौकरशाहों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की उम्मीद करना निरर्थक है। मगर नरेंद्र मोदी सरकार ने पारदर्शिता की अपनी यही प्राथमिकता दिखाई है। ध्यान दीजिए- पूर्व आईएफएस अधिकारी यशवर्द्धन कुमार सिन्हा, पूर्व आईआरएस अधिकारी वनजा एन. सरना, पूर्व आईएएस अधिकारी नीरज कुमार गुप्ता और पूर्व विधि सचिव सुरेश चंद्र की सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति की गई है। ये चारों अधिकारी इसी साल रिटायर हुए हैं।  और इसी साल उन्हें ये अहम पद दे दिए गए। इसके पहले इन पदों को लंबे समय तक खाली रखा गया। बीते महीने मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर और सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यलु, यशोवर्द्धन आजाद और अमिताव भट्टाचार्य के हाल ही में सेवानिवृत हो जाने के बाद सीआईसी में सिर्फ तीन सूचना आयुक्त बचे थे। आरटीआई कानून के मुताबिक केंद्रीय सूचना आयोग में कुल 11 पद हैं। इन चार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बाद भी अभी भी सीआईसी में कुल चार पद खाली हैं।

ध्यानार्थहै कि इस महीने की शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को सीआई में खाली पदों को भरने की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करने का निर्देश दिया था। कोर्ट की खंडपीठ ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी निर्देश दिया कि वे शॉर्ट लिस्ट किए गए उम्मीदवारों से संबंधित सूचना और सीआईसी के साथ-साथ राज्य सूचनाओं में नियुक्तियों के लिए अपनाए गए मापदंडों से संबंधित जानकारी अपनी वेबसाइटों पर अपलोड करें। अब नियुक्तियां हुई हैं, सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने आयुक्तों को चुनने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उनका आरोप है कि ये चयन पारदर्शी तरीके से नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सरकार चयन प्रक्रिया से संबंधित सभी जानकारी अपने वेबसाइट पर डाले, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया है। इस बात को भी लेकर सवाल है कि सरकार सिर्फ पूर्व नौकरशाहों का ही चयन कर रही है, जबकि आरटीआई कानून में लिखा है कि कुल आठ क्षेत्रों से सूचना आयुक्तों का चयन होना चाहिए ताकि विविधता बनी रहे।

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