अनिल अंबानी को एक और बड़ा ठेका!

फिलहाल मीडिया की चर्चा से क्रोनी कैपिटलिज्म गायब है। इसलिए कई ऐसी घटनाएं नजरों से निकल जाती हैं, जिन पर सामान्य स्थितियों में गरमागर्म चर्चा होती। गौरतलब है कि हाल में अनिल अंबानी की कंपनी आर.कॉम ने दिवालिया होने की अर्जी दी। ये ग्रुप कर्ज के बोझ तले दबा है। मगर उन्हीं अनिल अंबानी को राफेल सौदे में ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट मिला। अब ताजा खबर यह है कि गुजरात के राजकोट में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट निर्माण का ठेका भी उन्हीं की कंपनी को मिला है। ये अनुबंध पाने के लिए अनिल अंबानी की रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर के अलावा एलएंडटी, एफकॉन, दिलीप बिल्डकॉन और गायत्री प्रोजेक्ट सहित नौ कंपनियों ने आवेदन दिया था। रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर को गुजरात के राजकोट में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के निर्माण का ठेका मिल गया। एयरपोर्ट राजकोट के हीरासर में बनाया जाएगा। इस ठेके का मूल्य 648 करोड़ रुपये है। रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर की ओर से कहा गया है कि उसने सबसे ज्यादा तकनीकी स्कोर (92.2 फीसदी) हासिल किया। उसकी बोली सबसे कम थी।

मुमकिन है कि ये बातें सही हों। लेकिन क्या किसी कंपनी समूह की साख ऐसे ठेकों में अहम नहीं होनी चाहिए? क्या कोई भी सबसे कम कीमत की बोली लगाकर कोई भी बड़ा ठेका हासिल कर सकता है? क्या ऐसे फैसले लेते वक्त दूसरे क्षेत्रों में कंपनी समूह के रिकॉर्ड का कोई महत्त्व नहीं है? एयरपोर्ट का निर्माण अहमदाबाद और राजकोट को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के पास और राजकोट एयरपोर्ट से लगभग 36 किमी की दूरी पर किया जाएगा। एयरपोर्ट बनने से अहमदाबाद से आने वाले ट्रैफिक की निजात मिलने की उम्मीद है। कंपनी डिजाइनिंग, इंजीनियरिंग, रनवे, टैक्सीवे, एप्रन, फायर स्टेशन और इंस्ट्रूमेंट लाइटिंग सिस्टम के परीक्षण और निर्माण में शामिल होगी। एयरपोर्ट निर्माण का काम 30 महीनों में पूरा किया जाना है। ध्यानार्थ है कि अनिल अंबानी की कंपनी को ऐसे वक्त में एयरपोर्ट निर्माण का ठेका मिला है, जब उनकी कंपनी रिलायंस डिफेंस राफेल डील को लेकर विवाद में चल रही है। विपक्ष का आरोप है कि रक्षा क्षेत्र में रिलायंस का कोई अनुभव नहीं है, इसके बावजूद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को दरकिनार कर रिलायंस डिफेंस को ठेका दिया गया। फिलहाल अधिकारियों ने एयरपोर्ट कॉन्ट्रेक्ट को लेकर किसी भी तरह का विवाद होने से इनकार किया है। कहा है कि रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर का एयरपोर्ट निर्माण में अनुभव है। महाराष्ट्र में यह कंपनी प्रभावी मौजूदगी रखती है। ये तमाम बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं। मगर मुद्दा यह है कि वर्तमान सरकार के तहत आखिर एक कंपनी कैसे तमाम बड़े करार पाने में कामयाब हो रही है? 

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