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रोजगार की बदहाल हकीकत

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ने हाल में कहा कि 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर पिछले 45 साल के उच्चतम स्तर पर रही। मई में होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले आई आयोग की रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के बाद यह नौकरियों के बारे में किसी आधिकारिक संस्था की तरफ से पेश की गई पहली व्यापक अध्ययन रिपोर्ट थी। इससे पहले सेंटर फॉर इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) ने कहा था कि 2017 के शुरुआती चार महीनों में 15 लाख नौकरियां खत्म हो गईं। यानी नोटबंदी की सीधी मार लाखों लोगों के रोजगार पर पड़ी। आलोचक सरकार के इस कदम को एक बड़ी नाकामी बताते हैं। सीएमआईई का सर्वे बताता है कि शहरी इलाकों में बेरोजगारी की दर 7.8 प्रतिशत है, जो ग्रामीण इलाकों से भी ज्यादा है। देहाती इलाकों में सर्वे के मुताबिक 5.3 प्रतिशत बेरोजगारी दर दिखी। शहरी इलाकों में 15 से 29 वर्ष के पुरुषों के बीच बेरोजगारी दर 18.7 प्रतिशत थी, जबकि 2011-12 में यह आंकड़ा 8.1 प्रतिशत था। शहरी इलाकों में महिलाओं के बीच 2017-18 के दौरान 27.2 प्रतिशत बेरोजगारी दर्ज की गई। लेकिन सरकार नौकरियां के मुद्दे पर खामोश रही है। या फिर उसकी तरफ से वैकल्पिक दावे किए गए हैँ। सरकार का कहना है कि जो भी आंकड़े आए हैं, उनकी सच्चाई को परखना अभी बाकी है। नीति आयोग ने इस बारे में सफाई देने के लिए आनन-फानन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई।

लेकिन नीति आयोग के अधिकारियों को बेरोजगारी से जुड़ी राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों की व्याख्या करने में खासी दिक्कत पेश आई। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि इस रिपोर्ट की सच्चाई को अभी नहीं परखा गया है। अभी छठी तिमाही के आंकड़ों का इंतजार है। उनके बिना तिमाही दर तिमाही तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए मार्च तक इंतजार करना होगा। नीति आयोग का कहना है कि देश के कार्यबल में शामिल होने वाले नए लोगों के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर है। बहरहाल, सरकार भले राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की रिपोर्ट की सत्यता पर संदेह व्यक्त कर रही हो, लेकिन आयोग के दो सदस्यों ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि सरकार आंकड़े जारी नहीं करना चाहती। उन्होंने कहा- हमें दरकिनार किया जा रहा था। यह सिस्टम अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। यही आज सबसे बड़ा सवाल है। अगर विश्वसनीयता ना हो, तो सरकार की बातों का क्या मतलब होगा। वैसे भी हकीकत सबके सामने है। 

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