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कंपनी से रियायत क्यों

इसे जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी के लिए एक बड़ी राहत माना जा सकता है। पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिका की मशहूर फार्मा कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन के खिलाफ मरीजों के दोषपूर्ण हिप इंप्लांट (कूल्हा प्रतिस्थापन) का मामला बंद कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र ने पीड़ित मरीजों को 1.22 करोड़ रुपए तक मुआवजा दिलाने के लिए कदम उठाए हैं। लेकिन मुद्दा यह है कि इस कंपनी ने जो किया, क्या उसे आपराधिक गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए? क्या सिर्फ मुआवजा दिला देना काफी है? ये सवाल इसलिए अहम हैं क्योंकि इनका संबंध कंपनियों की जवाबदेही से है। अपेक्षित यह था कि दोषपूर्ण इंप्लांट बाजार में उतारने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की सीधी और आपराधिक जवाबदेही तय की जाती। जॉनसन एंड जॉनसन पर आरोप है कि उसकी हिप इंप्लांट डिवाइस की वजह से दुनिया भर के कई मरीजों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा है। भारत में कंपनी के गलत हिप इंप्लांट डिवाइस की वजह से लगभग 3600 मरीज प्रभावित हुए। कम से कम चार लोगों की मौत हो गई।

इन मौतों की भरपाई आखिर मुआवजे से कैसे हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने इस मामले में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के जवाब पर विचार किया। मंत्रालय ने कहा कि उसने मुआवजे की एक योजना तैयार की है, ताकि दोषपूर्ण हिप इंप्लांट के पीड़ितों के लिए उचित भरपाई सुनिश्चित की जा सके। कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर फैसला देते हुए केंद्र से कहा कि मुआवजा योजना का व्यापक प्रचार किया जाए, ताकि ऐसे प्रत्यारोपण के शिकार सभी पीड़ित अपनी समस्याओं के लिए मदद ले सकें। जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि 2005 से कूल्हे की सर्जरी कराने वाले 4,525 भारतीय मरीजों के शरीर में त्रुटिपूर्ण और घातक कृत्रिम कूल्हों का प्रत्यारोपण किया गया। पिछले सितंबर 2018 में सरकार ने  कहा था कि कंपनी मरीजों को कम-से-कम 20 लाख रुपये का मुआवजा दें। हालांकि पीड़ितों का कहना था कि ये राशि बहुत कम है। मशहूर फार्मा कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन ने 24 अगस्त, 2010 को ही दुनियाभर से अपनी दोषपूर्ण हिप इंप्लांट (कूल्हा प्रतिस्थापन) डिवाइस को वापस ले लिया था। मगर दुनिया भर में उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाइयां चल रही हैं। गौरतलब है कि पहली बार साल 2009 में जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी की दोषपूर्ण हिप इंप्लांट सिस्टम का मामला सामने आया था। तब से ये मामला दुनिया भर में चर्चित रहा है।

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