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घेरे में सरकार की अनदेखी

डूबते कर्ज (एनपीए) के बारे में संसदीय समिति को दी गई रघुराम राजन की रिपोर्ट को आधार बना कर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी एक दूसरे को घेरने की कोशिश की। लेकिन राजन ने जो कहा, उससे फिलहाल सबसे अहम सवाल सरकार पर उठे हैं। गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने एनपीए मामलों की एक सूची प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को सौंपी थी, ताकि उन मामलों की गंभीरतापूर्वक जांच की जा सके। लेकिन राजन की सूची ने न तो इस सरकार को और न ही पिछली सरकार को नींद से जगाया। वैसे यह सूची कब सौंपी गई, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह साफ है कि ऐसे खातों पर निगरानी बढ़ाने की दिशा में ही कोई कदम नहीं उठाए गए। यह इस बात से जाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की।

राजन ने यह खुलासा संसद के प्राक्कलन समिति (एस्टीमेट कमेटी) को सौंपे गए अपने 17 पन्नों के विस्तृत जवाब किया है। मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली प्राक्कलन समिति ने एनपीए संकट पर राजन को अपना पक्ष रखने के लिए कहा था। आम तौर पर यही माना गया कि राजन ने वर्तमान प्रधानमंत्री कार्यालय के बारे में बात की है। प्राक्कलन समिति अब राजन को प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई चिट्ठी की तारीख बताने के लिए कहने पर विचार कर रही है। राजन ने अपने जवाब में कहा है कि खराब कर्जों की एक बड़ी संख्या 2006-2008 के समय की है, जब आर्थिक विकास की गति मजबूत थी। विद्युत संयंत्रों जैसी बुनियादी ढांचे के क्षेत्र की पिछली परियोजनाएं समय पर और बजट के भीतर पूरी की गई थीं। ऐसे समय में बैंकों से गलतियां होती हैं। वे अतीत की वृद्धि और प्रदर्शन को आधार मानकर भविष्य का अनुमान लगाते है।

वे परियोजनाओं में ज्यादा मुनाफा और प्रमोटरों की कम हिस्सेदारी के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसा होना विभिन्न देशों में एक सामान्य बात रही है। राजन के मुताबिक 2008 में वैश्विक वित्तीय बाजार के चरमराने और वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद जब विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई। तब बैंकों द्वारा दिए गए कर्जे संकट में घिर गए। कोयला खदानों के संदिग्ध आवंटन जैसे शासन से जुड़ी कई समस्याओं और साथ ही जांच के डर ने दिल्ली में यूपीए और उसके बाद आई एनडीए दोनों ही सरकारों के फैसले लेने की चाल को सुस्त कर दिया। इससे स्थिति और बिगड़ी।

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