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नागरिकता बिल का विरोध

नागरिकता संशोधन विधेयक पर केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ रही हैं। पहले इस पर असम में उसकी सहयोगी पार्टी असम गण परिषद ने विरोध जताया। उसने धमकी दे रखी है कि अगर ये बिल पास हुआ तो वह भाजपा से अपना नाता तोड़ लेगी। असम गण परिषद इस मुद्दे पर जनता दल (यू) का समर्थन जुटाने में भी कामयाब है। जेडी-यू एलान कर चुका है कि वह इस बिल का समर्थन नहीं करेगा। सबसे हैरत की बात तो यह है कि शिव सेना ने भी इसे समर्थन देने से इनकार कर दिया है। विपक्ष पहले ही इस पर पुरजोर विरोध जताता रहा है। विपक्षी दलों के विरोध का मुख्य तर्क यह है कि यह बिल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। असम गण परिषद का विरोध असम की स्थानीय स्थितियों को लेकर है। मगर शिव सेना क्यों इसके खिलाफ हुई, कहना कठिन है। संभवतः यह गठबंधन की राजनीति में दबाव डालने का एक उपक्रम ही है, क्योंकि शिव सेना को सिद्धांततः हिंदूवादी राजनीति से कोई गुरेज नहीं हो सकता। बहरहाल, उत्तर-पूर्व में इस बिल का विरोध बढ़ता जा रहा है। असम समेत पूरे नार्थ-ईस्ट में व्यापक विरोध देखने को मिला है। सोमवार को छात्र संगठनों और अन्य कई स्थानीय समूहों ने नार्थ-ईस्ट में बंद की अपील की। जबकि इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिल्चर में अपनी रैली के दौरान इस विधेयक को लाने का पक्का इरादा जताया था। अगर यह विधेयक संसद में पास हो जाता है, तो पड़ोसी देशों- अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी। उत्तर-पूर्व के संगठनों का कहना है कि उस हाल में उस क्षेत्र में बाहरी लोगों की संख्या में भारी इजाफा होगा।

उससे स्थानीय नागरिक अल्पसंख्यक हो जाएंगे। नार्थ-ईस्ट छात्र संगठन ने कहा है कि “भारत सरकार का ये खाका बहुत खतरनाक है।” गौरतलब है कि इस प्रस्तावित संशोधन विधेयक में बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आए वहां के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। इन अल्पसंख्यकों में हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, बुद्ध और जैन समुदाय के लोगों को शामिल किया गया है। भाजपा के लिए यह विधेयक कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है। 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने नागरिकता कानून में सुधार करने की बात कही थी। मगर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम जैसे दल धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करने का विरोध कर रहे हैं।

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